देश की खबरें | लेखकों को अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे के विरुद्ध उठ खड़ा होना चाहिए: एम टी वासुदेवन नैयर

तिरुवनंतपुरम, दो फरवरी मशहूर लेखक एम टी वासुदेवन नैयर ने बृहस्पतिवार को कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी एवं असंतोष के स्वर पर सत्ता केंद्रों समेत विभिन्न वर्गों की ओर से जो गंभीर एवं नापाक हमले नजर आ रहे हैं, उसे देखकर लेखकों को चुप नहीं रहना चाहिए एवं अपना रचनात्मक जुनून छोड़ना नहीं चाहिए।

यहां चार-दिवसीय कनककुन्नू पैलेस में मातृभूमि अंतरराष्ट्रीय साहित्योत्सव (एमबीआईएफएल 2023) में अपने संबोधन में ज्ञानपीठ पुरस्कार सम्मानित लेखक नैयर ने कहा, ‘‘हम एक ऐसे दौर में रह रहे हैं, जहां भारत में अभिव्यक्ति की आजादी का मुकाबला असहिष्णुता एवं हिंसा से उत्पन्न चुनौतियों से हो रहा है। स्वतंत्र आवाज को दबाने का संगठित प्रयास किया जा रहा है।’’

उन्होंने कहा कि ‘असहिष्णु’ ताकतों की ओर से लेखकों पर दबाव बहुत अधिक है एवं यह पीड़ादायक भी है। उन्होंने कहा कि असंतोष के स्वर को दबाने के लिए आसपास नापाक ताकतें हैं।

नैयर ने कहा, ‘‘घिर जाने के बाद तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन ने यहां तक कह डाला कि वह लिखना बंद करने जा रहे हैं। लेकिन मैं कहूंगा कि दमनकारी ताकतों के सामने झुक जाने एवं चुप रह जाने के बजाय लेखकों को उठ खड़ा होना चाहिए।’’

उन्होंने कहा कि असहिष्णुता एवं हिंसा की वर्तमान संस्कृति का साया देश में रचनात्मक आजादी पर पड़ा है और यह बिल्कुल वैसा ही दृश्य है, जैसा धीरे-धीरे नाजी जर्मनी में हुआ था।

फिल्म निर्देशक, पटकथा लेखक और सांस्कृतिक पर्यवेक्षक के रूप में अपनी पहचान बना चुके नैयर ने कहा, ‘‘मेरा मानना है कि यह भारत में (संभव) नहीं हो सकेगा। फिर भी, सजग रहना और ऐसी चुनौतियों के प्रति डटकर खड़ा रहना जरूरी है।’’

बढ़ती धार्मिक असहिष्णुता को एक चिंता के तौर पर उठाते हुए उन्होंने कहा कि सभी धर्मों का मूल दर्शन है, जिसमें मानव के आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विकास की संकल्पना है तथा असहिष्णुता एवं हिंसा की उसमें कोई जगह नहीं है। उन्होंने कहा कि सच्चे धर्मावलंबियों को आगे आकर ऐसी प्रवृत्तियों का विरोध करना चाहिए।

(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)