नयी दिल्ली, 16 फरवरी उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि वह इस बात पर विचार करेगा कि वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा देने की कवायद के संबंध में उसके लिए और उच्च न्यायालयों के वास्ते दिशा-निर्देश वाले उसके 2017 के फैसले पर क्या फिर से गौर करने की जरूरत है।
न्यायमूर्ति एस. के. कौल, न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ ने वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ताओं का दर्जा देने के संबंध में मुद्दों को उठाने वाली अर्जियों पर सुनवाई करते हुए कहा, ‘‘दायरा वास्तव में यह है कि फैसले में कुछ संशोधन की आवश्यकता है या नहीं।’’
पीठ ने कहा, ‘‘आइये हम इसे इस बात तक सीमित रखें कि क्या उस फैसले पर दोबारा गौर करने की जरूरत है और अगर हां, तो किस हद तक।’’
शीर्ष अदालत को बताया गया कि अक्टूबर 2017 के फैसले में कहा गया था कि इसमें शामिल दिशानिर्देश ‘‘मामले के बारे में संपूर्ण नहीं हो सकते हैं और समय के साथ होने वाले अनुभव के आलोक में इसमें चीजें जोड़ने या हटाने के संबंध में उपयुक्त पुनर्विचार की आवश्यकता हो सकती है।’’
केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि सरकार इस मामले में दिन में अर्जी दाखिल करेगी।
वर्ष 2017 का फैसला वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह की याचिका पर दिया गया था।
उन्होंने पीठ को बताया कि प्रत्येक उच्च न्यायालय एक अलग प्रक्रिया अपना रहा है और उनका यह कहना है कि प्रक्रिया में कुछ एकरूपता होनी चाहिए।
मामले में पेश वकीलों ने वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा देने पर कुछ उच्च न्यायालयों द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया का उल्लेख किया। पीठ ने कहा, ‘‘हमारी उच्च न्यायालयों पर निगरानी का क्षेत्राधिकार नहीं हो सकता।’’ पीठ ने कहा, ‘‘आप कहते हैं कि यह ‘बार’ की चिंता है। हम सभी ‘बार’ का हिस्सा रहे हैं।’’
पीठ ने मामले की अगली सुनवाई की तिथि 22 फरवरी तय की।
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