देश की खबरें | जब भाषण के अनुवाद को लेकर नेहरू और हरिवंशराय बच्चन के बीच हुई तकरार

नयी दिल्ली, 21 जून राष्ट्रपति के भाषण का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद को लेकर देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और हिंदी के महान कवि हरिवंश राय बच्चन के बीच तकरार हुई थी।

नेहरू का मानना ​​था कि राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के अंग्रेजी भाषण का बच्चन द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद बहुत जटिल है जबकि कवि इस बात पर अड़े रहे कि उनके द्वारा किया गया अनुवाद जटिल नहीं बल्कि सही है। दोनों में से कोई भी इस मुद्दे को लेकर नरम पड़ने को तैयार नहीं थे।

वरिष्ठ पत्रकार कल्लोल भट्टाचार्य की पुस्तक ''नेहरू फर्स्ट रिक्रूट्स'' में इस वाकये का जिक्र किया गया है।

पुस्तक में इस घटना का जिक्र करते हुए बताया गया है कि नेहरू भाषण के हिंदी अनुवाद को लेकर बच्चन से नाराज हो गए। नेहरू ने बच्चन को विदेश मंत्रालय में हिंदी के लिए विशेष कार्य अधिकारी नियुक्त किया था।

इस पुस्तक के मुताबिक बहुचर्चित कृति 'मधुशाला' के रचयिता बच्चन 1955 में 1,000 रुपये के मासिक वेतन पर भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) में शामिल हुए थे। इससे पहले वह आकाशवाणी में काम करते थे, जहां उनका वेतन 750 रुपये प्रति माह था।

विदेश मंत्रालय में बच्चन की प्रमुख जिम्मेदारियों में से एक - राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के भाषणों का अनुवाद करना था। वास्तव में 'एक्सटरनल एफेयर्स मिनिस्ट्री' के लिए 'विदेश मंत्रालय' शब्द बच्चन द्वारा दिया गया था।

नेहरू और बच्चन के बीच बहस तब हुई जब कवि ने राष्ट्रपति के अंग्रेजी भाषण का हिंदी में अनुवाद किया, जो नियमित प्रथा के अनुसार उपराष्ट्रपति जाकिर हुसैन द्वारा पढ़ा जाना था।

पुस्तक के मुताबिक, नेहरू ने हिंदी अनुवाद को लेकर नाराजगी जताते हुए कहा, ‘‘ क्या आपको पता है कि यह भाषण कौन पढ़ेगा? डॉ. जाकिर हुसैन - और वह आपके द्वारा इस्तेमाल किए गए कुछ शब्दों का उच्चारण भी नहीं कर पाएंगे।’’

बच्चन ने इसके जवाब में कहा, ‘‘ पंडित जी, किसी व्यक्ति की उच्चारण सुविधा के अनुसार नहीं बदली जा सकती, आप भाषण का उर्दू में अनुवाद क्यों नहीं करवा लेते? ’’

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