नयी दिल्ली, 16 मई दिल्ली उच्च न्यायालय ने सरकारी नौकरी का वादा कर निर्दोष लोगों को ठगे जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए एक महिला को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया जिस पर नकली पुलिस अधिकारी बन लोगों को धोखा देने और उन्हें फर्जी प्रशिक्षण देने का आरोप है।
उच्च न्यायालय ने आरोपी महिला की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए यह भी कहा कि यह एक बहुत ही गंभीर अपराध है जिसकी ठीक से जांच किए जाने की आवश्यकता है।
न्यायमूर्ति दिनेश कुमार शर्मा ने कहा, “मैं समझता हूं कि वर्तमान मामले के तथ्य बहुत गंभीर प्रकृति के हैं। ऐसे कई मामले हैं जहां सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर निर्दोष लोगों को बहकाया जा रहा है और धोखा दिया जा रहा है। यह एक बहुत ही गंभीर अपराध है जिसकी गहन जांच की आवश्यकता है और यह अग्रिम जमानत देने के लिए उपयुक्त मामला नहीं है।”
अभियोजन पक्ष के अनुसार, एक व्यक्ति की शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज की गई थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि सह-आरोपी आशीष चौधरी ने उसे अपने दादा-दादी के माध्यम से सरकारी नौकरी दिलाने की पेशकश की थी और 3.5 लाख रुपये की मांग की थी।
पीड़ित ने आशीष व अमित नाम के एक अन्य आरोपी को कुल साढ़े पांच लाख रुपये की रकम दी।
शिकायतकर्ता ने बताया कि उसे ‘डिपार्टमेंट ऑफ क्रिमिनल इंटेलीजेंस’ का एक नियुक्ति पत्र भी जारी किया गया तथा उसकी नियुक्ति कांस्टेबल के पद पर दर्शाई गई थी और उसे फर्जी प्रशिक्षण भी दिलवाया गया।
अभियोजक ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा कि महिला सविता टोकस वर्तमान मामले में सह-आरोपी व्यक्तियों के साथ सीधे तौर पर शामिल पाई गई है। वह फर्जी विभाग में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक/पुलिस अधीक्षक बनकर पीड़ितों को प्रशिक्षण देती थी।
(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)













QuickLY