नयी दिल्ली, 30 जून वैवाहिक विवादों में छल से साक्ष्य जुटाने के तरीकों पर अस्वीकृति जताते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि विवाह एक ऐसा संबंध है जिसकी पवित्रता अभी भी समाज में बनी हुई है।
साथ ही अदालत ने कहा कि ऐसे मामले में छल से साक्ष्य जुटाने से लोगों के निजी और पारिवारिक जीवन में तूफान खड़ा हो सकता है।
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अदालत ने अपनी टिप्पणी ने कहा, सिर्फ इसलिए क्योंकि साक्ष्यों को स्वीकार करने में नियम बेहद नरमी बरतता है, इससे यह नहीं समझा जाना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति को विवाह जैसे मामले में गैर कानूनी तरीके से साक्ष्य जमा करने की अनुमति मिल गयी है।
न्यायमूर्ति अनूप जे. भम्भानी ने कहा कि कानून को हमेशा भावनाओं से ऊपर रखा जाना चाहिए और किसी भी नरम वैधानिक कानून को अवैध तरीके से साक्ष्य जमा करने का लाइसेंस नहीं मान लिया जाना चाहिए।
उच्च न्यायालय ने एक याचिका में परिवार अदालत के उस आदेश को चुनौती दी है जिसमें निचली अदालत ने उसके पति को सीडी में साक्ष्य लाने और उनके सच्चे होने का प्रमाण फॉरेंसिक प्रयोगशाला में जांच के द्वारा करवाने की अनुमति दी है।
परिवार अदालत के समक्ष चल रही तलाक की सुनवाई के दौरान पति ने साक्ष्य के रूप में एक ऑडियो-वीडियो सीडी अदालत को सौंपी थी जिसमें कथित रूप से पत्नी अपनी सहेली से पति और उसके परिवार के बारे में बेहद खराब तरीके बात कर रही है और इसे पति के खिलाफ क्रूरता माना गया।
इस पर पत्नी ने विरोध करते हुए कहा कि यह पूरी बातचीत उसके निजता के अधिकार का हनन करते हुए रिकॉर्ड की गई है, ऐसे में इसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
उच्च न्यायालय ने अपने 46 पृष्ठों के आदेश में परिवार अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि इसमें कोई गड़बड़ी नहीं है।
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