जरुरी जानकारी | हथकरघा बुनकरों के योगदान को बताती है पुस्तक ‘द इंडिक कोशंट’

नयी दिल्ली, छह अगस्त भारत शुक्रवार को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाने के लिए तैयार है। इस बीच, एक पुस्तक में हथकरघा बुनकरों के सम्मान तथा तथा देश के सामाजिक आर्थिक विकास में इस स्वदेशी उद्योग के योगदान को बताने का प्रयास किया गया है।

कनिका मिश्रा की पुस्तक ‘‘द इंडिक कोशंट’’ में बुनकरों के साथ जमीन पर काम करने वाले उन व्यक्तियों और संगठनों के पांच महत्वपूर्ण प्रयासों पर प्रकाश डाला गया है, जो देश और विदेश में उनके उत्पाद के लिए बेहतर मूल्य दिलाने का प्रयास करते हैं। साथ वे भारतीय पारंपरिक कला को संरक्षित करने और उसको बढ़ावा देने के आंदोलन का हिस्सा हैं।

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लेखिका का कहना है कि हथकरघा वस्त्र प्राचीन भारत से निर्यात की मुख्य वस्तुओं में से एक थे और भारत में कृषि के बाद भी हाथ से बुनाई दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक गतिविधि है।

ब्लूम्सबरी इंडिया द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक, मध्यप्रदेश के महेश्वर से बिहार के मिथिला तक बुनाई समुदाय के हृदय स्थल में लेखिका की यात्रा का वर्णन करती है। यह समुदाय पीढ़ियों से इस कला का संरक्षण कर रहा है।

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"इंडिक कोशंट’ बुनकरों से उन लोगों तक का रास्ता तय करती है जो बिक्री की सुविधा देते हैं और जिन उद्यमियों ने हथकरघा उत्पादों को एक ‘फैशन स्टेटमेंट’ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पुस्तक में इस क्षेत्र के लोगों के साथ लेखिका के साक्षात्कार, बुनकरों के बीच आये सकारात्मक बदलाव और उनके समक्ष आई चुनौतियों को बताया गया है।

महेश्वर में चौथी पीढ़ी के बुनकर मूलचंद श्रवणकर ने बचपन से ही माहेश्वरी साड़ियों की बुनाई शुरू कर दी थी, जो मालवा की 18 वीं शताब्दी की रानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा पेश किया गया एक शिल्प है। श्रावणकर बहुत कम कीमत पर इन्हें थोक बिक्री के लिए देते हैं। ऐसी वास्तविक कहानियों का उल्लेख इस पुस्तक में किया गया है। अब उनके पास शहर में कुछ करघे और एक खुदरा दुकान है।

पुस्तक में शुरू किए गए कुछ प्रमुख उपक्रमों पर भी प्रकाश डाला गया है, जिससे इन बुनकरों को अपनी साड़ियों और कपड़ों की सामग्री के लिए बेहतर मूल्य प्राप्त करने में मदद मिली है। ऐसे ही एक संगठन गोकॉप ने 'हथकरघा उत्पाद (ई-कॉमर्स) के विपणन' में उत्कृष्ट योगदान के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीता।

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