नयी दिल्ली, तीन फरवरी उच्चतम न्यायालय ने सशस्त्र बलों के कर्मियों द्वारा आत्महत्या करने के मामलों से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई करने से सोमवार को इनकार कर दिया और कहा कि आरोपों की प्रकृति व्यापक है।
न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका में मामलों की पड़ताल करना उच्चतम न्यायालय के लिए संभव नहीं होगा।
पीठ ने सभी याचिकाकर्ताओं और छत्तीसगढ़ से संबंधित याचिका में लगाए गए आरोपों पर गौर किया।
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘यदि याचिकाकर्ता चाहें तो वे शिकायतों के निवारण के लिए अधिकार क्षेत्र वाले उच्च न्यायालय का रुख कर सकते हैं।’’
पीठ ने फरवरी 2020 में केंद्र को नोटिस जारी करके याचिका पर जवाब मांगा था। याचिका अधिवक्ता सत्य मित्रा के माध्यम से दायर किया गया था।
सोमवार को केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज ने कहा कि याचिका में सामान्य अनुरोध किया गया है और अगर याचिकाकर्ताओं को कोई शिकायत है, तो वे संबंधित अधिकारियों को अपना प्रतिवेदन दे सकते हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने सशस्त्र बलों के कर्मियों द्वारा आत्महत्या के आंकड़ों का हवाला दिया और कहा कि केंद्र को इसे रोकने के लिए किये जा रहे उपायों के बारे में बताना चाहिए।
गोंजाल्विस ने कहा, ‘‘उनके पास एक व्यवस्था होनी चाहिए।’’ उन्होंने जूनियर स्तर पर सेवारत सशस्त्र बल कर्मियों के साथ कथित दुर्व्यवहार का उल्लेख किया। उन्होंने कहा, ‘‘उनके पास कुछ उपाय होने चाहिए। छुट्टी देने से मना करने के कुछ मामले हैं।’’
हालांकि, पीठ ने कहा, ‘‘यह देशभर में मामलों की पड़ताल करने जैसा है।’’
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