गोपेश्वर (उत्तराखंड), एक मार्च बद्रीनाथ और माणा घाटी में सर्दियों में होने वाले हिमस्खलन की घटनाएं आम बात हैं, लेकिन बर्फबारी के बाद जनवरी और मार्च के बीच इनकी आशंका बढ़ जाती है।
हिमस्खलन के डर से माणा और आसपास के गांवों में रहने वाले लोग हर साल सर्दियों की शुरुआत के बाद घाटी के निचले इलाकों में चले जाते हैं।
पर्यावरणविद और चिपको आंदोलन के नेता चंडी प्रसाद भट्ट ने कहा कि बद्रीनाथ के मुख्य मंदिर को छोड़कर बद्रीपुरी का एक बड़ा क्षेत्र हिमस्खलन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।
गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित भट्ट ने कहा, ‘‘यदि हम इस क्षेत्र में हिमस्खलन की पिछली घटनाओं को देखें तो बद्रीपुरी को लगभग हर दशक में हिमस्खलन के कारण नुकसान होता रहता है। वर्ष 2014 में बद्रीनाथ के नारायण पर्वत क्षेत्र में हिमस्खलन के कारण भारी क्षति हुई थी।’’
उन्होंने कहा कि अतीत में हिमस्खलन से न केवल बद्रीपुरी बल्कि माणा और आसपास के गांवों में भी जान-माल का नुकसान हुआ था।
भट्ट ने कहा कि कुछ साल पहले एक बैठक में इस क्षेत्र में काम कर रहे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के वैज्ञानिकों, विशेष रूप से हिमाचल प्रदेश के ‘एसएएसए’ के वैज्ञानिकों से अनुरोध किया गया था कि हिमस्खलन के लिए सबसे जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान की जानी चाहिए। यह भी सिफारिश की गई कि इन क्षेत्रों में तैनात लोगों के लिए सर्दियों में रहने के लिए सुरक्षित स्थानों का चयन करने की व्यवस्था की जानी चाहिए।
शुक्रवार को माणा गांव के पास हिमस्खलन हुआ। यह बद्रीनाथ से लगभग एक किलोमीटर दूरी पर स्थित है और सीमा पर पहला गांव है।
चमोली जिले के माणा गांव में सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) के शिविर में हिमस्खलन के कारण बर्फ के नीचे दबे 50 श्रमिकों को बाहर निकाल लिया गया है, लेकिन चार श्रमिकों की शनिवार को मौत हो गई। बचाव दल शेष पांच श्रमिकों को बचाने के लिए कड़ी मशक्कत कर रहा है।
माणा के लोगों के पूर्वज, जिनमें चार सौ से ज़्यादा आदिवासी परिवार शामिल हैं, भेड़ पालते थे और तिब्बत के लोगों के साथ व्यापार करते थे। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद व्यापार बंद हो गया।
मूल निवासी अप्रैल के आखिरी हफ्ते और मई की शुरुआत में माणा लौट आते हैं। वे नवंबर तक खेती करते हैं और फ़सलें खास तौर पर आलू और सब्जियां उगाते हैं।
नवंबर में सर्दी शुरू होते ही वे माणा से करीब सौ किलोमीटर दूर गोपेश्वर के पास चले आते हैं।
प्रधान पीतांबर सिंह मोल्फा ने ‘पीटीआई-’ को बताया कि माणा में सदियों से अत्यधिक ठंड के कारण घाटी के निचले इलाकों में चले जाने की परंपरा चली आ रही है।
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