देश की खबरें | मुझपर लगाए गए आरोप गलत हैं, मैंने अभी तक जो मामले उठाए हैं, सभी सही साबित हुए हैं : हिमांशु

दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़), 19 जुलाई राज्य के नक्सल प्रभावित बस्तर क्षेत्र में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार का कहना है कि उनपर लगाए गए आरोप गलत हैं और उनके द्वारा उठाए गए सभी मामले अभी तक सही साबित हुए हैं।

गौरतलब है कि इस महीने की 14 तारीख को उच्चतम न्यायालय ने हिमांशु कुमार और अन्य की उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें 2009 में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में सुरक्षा बलों द्वारा कथित रूप से कुछ आदिवासियों के नरसंहार मामले की जांच सीबीआई से कराये जाने का अनुरोध किया गया था।

उच्चतम न्यायालय की पीठ ने पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाते हुए इस याचिका को खारिज किया था।

हिमांशु ने नयी दिल्ली में एक बयान जारी कर कहा है, ''14 जुलाई को उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि 16 आदिवासियों की हत्या के बाबत दायर किया गया मुकदमा झूठा है और इसके लिए हिमांशु कुमार पर पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाय और मुझ पर धारा 211 के अंतर्गत मुकदमा चलाया जाय तथा सीबीआई मेरा सम्बन्ध माओवादियों से होने की जांच भी कर सकती है।''

कुमार ने कहा है, ''इस बारे में मेरा कहना यह है कि इस मामले को झूठा कैसे कहा जा सकता है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट (उच्चतम न्यायालय) ने इसकी कोई जांच ही नहीं कराई है।''

उन्होंने आरोप लगाया है, ''2009 में छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले के गोमपाड गांव में सोलह आदिवासियों की पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा हत्या की गई थी। मारे गए लोगों में महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग सभी थे। डेढ़ साल के एक बच्चे की उंगलियाँ काट दी गई थीं।’’

हिमांशु कुमार ने कहा है, ''उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि मैंने यह मुकदमा माओवादियों की मदद करने के लिए किया है। लेकिन मुझे यह समझ में नहीं आ रहा कि अगर न्यायालय पीड़ितों को न्याय देगा तो उससे माओवादियों को क्या फायदा होगा? और अगर न्याय ना दिया जाय तथा मुझ जैसे न्याय मांगने वाले व्यक्ति पर ही जुर्माना लगा दिया जाय तो उससे देश का क्या फायदा होगा?’’

उन्होंने कहा, ‘‘मैंने पहली बार अदालत में कोई मुकदमा दायर नहीं किया। मैंने 519 मामले उच्चतम न्यायालय को सौंपे हैं जिनमें पुलिस द्वारा की गई हत्याओं, बलात्कार, अपहरण और लूट के मामले शामिल हैं।’’

उन्होंने कहा है, ''मेरे द्वारा उठाए गए मामले सही साबित हुए हैं। एक भी मामला झूठा नहीं पाया गया है।''

सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा, ''न्यायालय ने कहा है कि इस मामले में पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कर ली थी और आरोपपत्र भी दाखिल कर दिया था। इसलिए हमें पुलिस की कार्यवाही पर भरोसा करना चाहिए था और न्यायालय नहीं आना चाहिए था। लेकिन जो पुलिस हत्या करने वाले गिरोह में शामिल है उसकी जांच पर पीड़ित कैसे भरोसा कर सकते हैं। पीड़ित आदिवासी इसीलिये न्यायालय आये थे क्योंकि उन्हें पुलिस के खिलाफ ही न्याय चाहिए था। इसलिए उन्होंने मांग की थी कि सीबीआई या एसआईटी से जांच कराई जाय क्योंकि पुलिस ही हत्याकांड में शामिल थी।''

कुमार ने कहा, ''इसके अलावा पीड़ित ग्रामीणों ने पहले दंतेवाडा के पुलिस अधीक्षक को पूरी घटना की शिकायत लिख कर भेजी थी लेकिन उन्होंने कोई मदद नहीं की। एसपी को भेजे गये इन शिकायती पत्रों की प्रतिलिपि न्यायालय को सौंपी गई थी। न्यायालय को जानकारी थी कि स्थानीय पुलिस ने कोई मदद नहीं की।’’

गौरतलब है कि 2009 में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में कथित सुरक्षा बलों द्वारा कुछ आदिवासियों के नरसंहार मामले की जांच सीबीआई से कराये जाने के अनुरोध संबंधी याचिका पर सुनवाई करते हुए इस महीने की 14 तारीख को उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि एक कथित अपराध की जांच केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से कराये जाने का निर्देश ‘‘केवल अपील करने के आधार पर’’ ही नहीं दिया जाना चाहिए।

न्यायालय ने कहा था कि जांच को स्थानांतरित करने की शक्ति का इस्तेमाल ‘‘संयम’’ से और केवल ‘‘असाधारण परिस्थितियों में’’ किया जाना चाहिए।

हिमांशु कुमार छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले में 1992 से 2009 तक वनवासी चेतना आश्रम के नाम से सामाजिक संगठन के संचालक थे।

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