नयी दिल्ली,10 जून कोविड-19 महामारी के चलते लागू राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन और आर्थिक मंदी की मार झेल रहे नोएडा और ग्रेटर नोएडा इलाकों की रियल एस्टेट कंपनियों को बुधवार को उच्चतम न्यायालय से राहत मिल गई।
दरअसल, न्यायालय ने जमीन की लंबित बकाया राशि पर प्राधिकरणों द्वारा ली जाने वाली ब्याज दर की अधिकतम सीमा आठ प्रतिशत निर्धारित कर दी है, जो 15 से 23 प्रतिशत थी।
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न्यायालय ने कहा कि रियल एस्टेट क्षेत्र की मौजूदा स्थिति पर विचार करते हुए, परियोजनाएं रुक गयी हैं और मुख्य रूप से मकान खरीददारों की दशा को देखते हुए इस क्षेत्र को राहत प्रोत्साहन की जरूरत है।
न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा और न्यायमूर्ति यू यू ललित की पीठ ने नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरणों को रियल एस्टेट क्षेत्र की मौजूदा स्थिति पर विचार करते हुए रियल एस्टेट कंपनियों के बकाये के भुगतान की शर्तों में बदलाव करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने कहा कि मौजूदा स्थिति यह है कि 2005 में 114 भूखंड दिये गये थे, जिनमें से ज्यादातर परियोजनाएं अधूरी हैं।
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पीठ ने कहा, ‘‘हम निर्देश देते हैं कि इस तरह के सभी मामलों में लंबित प्रीमियम और अन्य बकाया राशि आठ प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर पर ली जाए तथा नोएडा एवं ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण पुनर्भुगतान कार्यक्रम में बदलाव करे, ताकि राशि की अदायगी हो सके...।’’
पीठ ने कहा, ‘‘हमने 23 जुलाई, 2019 के फैसले में इस बात का जिक्र किया था कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरणों द्वारा दिये गये आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2005 के बाद विभिन्न ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी को 114 भूखंड आवंटित किये गये। वहीं, 81 परियोजनाएं कुल प्रीमियम के 10 प्रतिशत के भुगतान पर सौंपी गई। जबकि 81 में से 29 परियोजनाएं पूरी हो गई हैं। पहले आवंटित अन्य 33 परियोजनाओं में 11 पूरी हो गई है और सात ने आंशिक रूप से पूरे होने के प्रमाण पत्र हासिल कर लिये। इस तरह यह जाहिर है कि 60 प्रतिशत से अधिक परियोजनाएं अभी तक पूरी नहीं हो पाई हैं। ’’
न्यायालय ने कहा कि बड़ी संख्या में मकान खरीददार आठ से 10 वर्षों से या इससे अधिक समय से इन आवासीय परिसरों का निर्माण कार्य पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं तथा इस बात में कोई संदेह नहीं है कि रियल एस्टेट क्षेत्र को फिलहाल एक झटका लगा है।
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