विदेश की खबरें | वैज्ञानिकों ने उन कोविड-19 मरीजों की पहचान की जो जल्दी ठीक हुए और उनमें स्थायी एंटीबॉडी बना

बोस्टन (अमेरिका), चार नवंबर अनुसंधानकर्ताओं ने कोविड-19 के उन मरीजों के उप समूहू की पहचान की है जो जल्दी ठीक हुए और शरीर में विकसित एंटीबॉडी ने कोरोना वायरस के खिलाफ तेजी से काम किया।

वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इससे प्रतिरोधक प्रणाली के काम करने के तरीके की जानकारी और बीमारी के खिलाफ टीका विकसित करने में मदद मिलेगी।

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अमेरिका स्थित ब्रिघम ऐंड वुमेन हॉस्पिटल सहित विभिन्न संस्थानों के वैज्ञानिकों ने कोविड-19 के हल्के से मध्यम लक्षणों से ठीक हुए मरीजों की जांच की और पाया कि जहां एक ओर अधिकतर मरीजों में समय के साथ एंटीबॉडी के स्तर में कमी आ जाती, वहीं कुछ लोगों में इस एंटीबॉडी का स्तर संक्रमण के बाद भी कई महीनों तक बना रहता है।

अनुसंधानकर्ताओं के मुताबिक पिछले अध्ययन में इस बारे में विरोधाभासी जानकारी दी गई थी कि जल्द ठीक होने वाले मरीजों में संक्रमण से रक्षा करने वाली एंटीबॉडी बनी रहती है या नहीं।

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मौजूदा अनुसंधान के नतीजों को ‘जर्नल सेल’ में प्रकाशित किया गया है। इसमें रेखांकित किया गया है कि लंबे समय तक कायम रहने वाले एंटीबॉडी कम समय तक लक्षण वालों में विकसित होते हैं जो संकेत करता है कि कुछ लोग जो कोविड-19 से जल्दी ठीक हो जाते हैं उनमें वायरस के खिलाफ प्रभावी और लंबे समय तक लड़ने की प्रणाली विकसित होती है।

ब्रिघम ऐंड वुमेन हॉस्पिटल की सह शोधपत्र लेखक डुएने वेसिमैन ने कहा, ‘‘ हमने उन लोगों के उप समूह का पता लगाया है जिनमें कोविड-19 से ठीक होने के बाद स्थायी एंटीबॉडी विकसित हुई।’’

इस अध्ययन में अनुसंधानकर्ताओं ने मार्च से जून 2020 तक बोस्टन के इलाके में कोविड-19 बीमारी से ठीक हुए 92 लोगों को शामिल किया।

अध्ययन के मुताबिक इन मरीजों में से पांच को अस्पताल में भर्ती कराया गया था जबकि बाकी का इलाज गृह एकांतवास में हुआ।

वैज्ञानिकों ने बताया कि जिन लोगों में ‘स्थायी’ एंटीबॉटी विकसित हुई उनमें औसतन 10 दिन तक लक्षण रहा जबकि सामान्य एंटीबॉडी वालों में औसतन 16 दिन तक वायरस का असर रहा।

उन्होंने कहा स्थायी एंटीबॉडी वालों की ‘टी’ कोशिका और ‘बी’ कोशिका में भी अंतर देखने को मिला। बता दें कि दोनों प्रकार की कोशिकाएं प्रतिरोध के लिए संक्रमण संबंधी आकंडों को सुरक्षित रखने और रक्षा करने में अहम भूमिका निभाती हैं।

वेसिमैन ने कहा, ‘‘आंकड़ों से रेखांकित हुआ कि यह प्रतिरोधक प्रणाली न केवल वायरस के लक्षणों को ठीक करने में कारगर रहा बल्कि उन कोशिकाओं का भी बेहतर उत्पादन किया जो लंबे समय तक वायरस के खिलाफ स्थायी आईजीजी एंटीबॉडी बनाते हैं।

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