ताजा खबरें | केंद्रीय मंत्री करंदलाजे पर भाजपा के गढ़ में जीत बरकरार रखने का दबाव

बेंगलुरु, 19 अप्रैल लोकसभा चुनाव में केंद्रीय मंत्री करंदलाजे की सीट बदलकर बेंगलुरु उत्तर से उम्मीदवार बनाये जाने के बाद उन पर इस निर्वाचन क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की जीत का सिलसिला बरकरार रखने का दबाव है।

बेंगलुरू उत्तर 2004 से भाजपा का गढ़ है और मतदाता ‘‘मोदी फैक्टर’’ पर भरोसा कर रहे हैं।

करंदलाजे का मुकाबला कांग्रेस उम्मीदवार एवं पूर्व राज्यसभा सदस्य एम.वी. राजीव गौड़ा से है, जो उन्हें जोरदार टक्कर देने की कोशिश कर रहे हैं। दोनों वोक्कालिगा समुदाय से ताल्लुक रखते हैं।

करंदलाजे उडुपी-चिकमंगलूर से दो बार की सांसद हैं, लेकिन उनकी पार्टी के एक वर्ग के ‘‘शोभा वापस जाओ’’ अभियान के बाद उन्हें इस सीट से हटा दिया गया।

करंदलाजे लोगों के बीच जाकर उन्हें समझा रही हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत पिछले 10 वर्षों में किस तरह विकास पथ पर आगे बढ़ा है।

कृषि और किसान कल्याण राज्य मंत्री ने कहा, ‘‘ यह भारत की संस्कृति और सनातन परंपराओं को बचाने के लिए चुनाव है।’’

भाजपा सूत्रों के मुताबिक, उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री एवं भाजपा के वरिष्ठ नेता बी.एस. येदियुरप्पा का मजबूत समर्थन प्राप्त है।

भाजपा 2004 से इस सीट पर जीत हासिल करती आ रही है। इससे पहले यह 1952 से 2004 तक कांग्रेस का गढ़ रहा था। हालांकि, 1996-1998 के दौरान तत्कालीन जनता दल के के.सी. नारायणस्वामी यहां से सांसद रहे।

पूर्व रेल मंत्री सी.के. जाफर शरीफ इस निर्वाचन क्षेत्र से सबसे लंबे समय तक सांसद रहे। उन्होंने 1977 से 1996 तक लगातार पांच बार चुनाव जीता और कुल सात बार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया।

वर्ष 2004 के बाद से यहां से भाजपा के तीन सांसद रहे हैं, जिनमें कर्नाटक के पूर्व पुलिस महानिदेशक एच टी संगलियाना, दिवंगत डी.बी. चंद्र गौड़ा और पूर्व केंद्रीय मंत्री डी.वी. सदानंद गौड़ा शामिल हैं। इन सभी को ‘‘बाहरी’’ माना जाता है।

बेंगलुरु उत्तर में विधानसभा की कुल आठ सीट हैं जिनमें से पांच का प्रतिनिधित्व भाजपा और शेष का कांग्रेस कर रही है।

पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे राजीव गौड़ा ने आरोप लगाया कि करंदलाजे को ‘‘सांप्रदायिक रूप से विभाजनकारी’’ भाषण और ध्रुवीकरण के लिए जाना जाता है।

भारतीय प्रबंध संस्थान बेंगलुरु के पूर्व प्रोफेसर ने कहा कि लोग बेहतर जीवन जीना, आगे बढ़ना और समृद्ध होना चाहते हैं और लोग नहीं चाहते कि यह क्षेत्र सांप्रदायिक रूप से विभाजित हो जाए।

उन्होंने दावा किया कि इस लोकसभा चुनाव में कर्नाटक में कोई मोदी लहर नहीं है।

वर्ष 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में यहां लगभग 12,000 मतदाताओं ने ‘नोटा’ का विकल्प चुना था।

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