नयी दिल्ली, 21 जुलाई संसद की एक समिति ने अंतर सेना संगठन (कमान, नियंत्रण और अनुसंधान) विधेयक के प्रावधानों पर सहमति व्यक्त करते हुए सिफारिश की है कि इसे बिना किसी संशोधन के पारित किया जाए और इस दौरान समिति की टिप्पणियों पर विचार किया जाए।
भारतीय जनता पार्टी के सांसद जुएल ओराम की अध्यक्षता वाली रक्षा संबंधी स्थायी समिति ने शुक्रवार को लोकसभा में अंतर सेना संगठन (कमान, नियंत्रण और अनुसंधान) विधेयक 2023 अपनी रिपोर्ट पेश की।
रिपोर्ट के अनुसार, समिति ने संज्ञान लिया कि वर्तमान में भारतीय सेना, नौसेना और वायु सेना के कर्मियों को उनके विशिष्ट सेना अधिनियम अर्थात सेना अधिनियम 1950, नौसेना अधिनियम 1957 और वायु सेना अधिनियम 1950 के उपबंधों के अनुसार शासित किया जाता है।
समिति इस ओर भी ध्यान दिया कि इस अधिनियम को लागू करने के समय अधिकांश सेना संगठनों में बड़े पैमाने पर थलसेना, नौसेना एवं वायु सेना के कर्मी शामिल थे। वर्तमान में अंडमान निकोबार कमान, सामरिक बल कमान, रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी जैसे कई अंतर सेना संगठन, राष्ट्रीय रक्षा अकादमी तथा राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय जैसे संयुक्त प्रशिक्षण संस्थान हैं, जहां सशस्त्र बलों और अन्य बलों के कर्मी एक साथ कार्य करते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तथ्य के बावजूद कई अंतर सेना संगठन पूर्ण रूप से प्रचलन में है, फिर भी अंतर सेना संगठन के कमांडर इन चीफ या ऑफिसर इन कमांड को अब तक अन्य सेनाओं से संबंधित कार्मिकों के अनुशासनात्मक या प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग करने का अधिकार नहीं है।
रिपोर्ट के अनुसार, वास्तविकता यह है कि केवल संबंधित सेनाओं के अधिकारियों को ही सेना अधिनियम के अधीन ही सेना कार्मिकों पर अनुशासनात्मक शक्तियों का प्रयोग करने का अधिकार है। इस प्रकार इन संगठनों में सेवारत कार्मिकों पर किसी भी प्रकार की अनुशासनात्मक या प्रशासनिक कार्रवाई के लिए उनकी मूल सेना इकाइयों में वापस भेजना जरूरी होता है।
रिपोर्ट के अनुसार समिति को यह बताया गया कि रक्षा मंत्रालय को अंतर सेना संगठन प्रतिष्ठानों में तैनात सेना कर्मियों पर अनुशासनात्मक और प्रशासनिक कार्रवाई संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इन चुनौतियों का मूल कारण है कि ऐसे संगठनों में सेवारत कर्मियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए उनकी मूल सेना इकाइयों में वापस भेजना अपेक्षित होता है।
इसमें कहा गया है कि इसमें दोषी कर्मियों के साथ-साथ मामले से संबद्ध गवाहों को भी उनसे संबंधित कमान/मुख्यालयों में वापस भेजा जाना शामिल है । इसके अनुसार इस प्रक्रिया के लिए विभिन्न सेना मुख्यालय द्वारा प्राधिकरण या कार्रवाई की आवश्यकता होती है जिसके कारण मामलों का अंतिम रूप से निस्तारण करने में विलंब होता है।
समिति ने कहा कि इसके परिणामस्वरूप तुरंत न्याय प्रदान करने और अनुशासन मानकों के अनुपालन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है । इसने कहा कि इसके अलावा पूरी प्रक्रिया के दौरान दोषी कर्मियों द्वारा अपने नियमित कर्तव्यों का निर्वहन नहीं किया जाता है और इससे श्रम घंटों का नुकसान होता है।
रिपोर्ट के अनुसार, समिति प्रस्तावित विधान में व्यापक उद्देश्य और भावना की सराहना करती है जिसका उद्देश्य संगठनों के प्रमुखों को वायु सेना, थल सेना और नौसेना के सभी कार्मिकों और केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य बलों में कार्यरत कर्मियों को लेकर संबंधित अधिनियम में संशोधन किये बिना प्रभावी कमान नियंत्रण और अनुशासन बनाए रखने में समर्थ बनाना है।
रिपोर्ट के अनुसार, समिति नोट करती है कि विधेयक में अनुशासनात्मक शक्तियों के अलावा संगठनों की कार्य दक्षता में सुधार के लिए अंतर सरकारी संगठन (आईएसओ) के प्रमुखों को प्रशासनिक शक्तियां देने का भी उपबंध किया गया है। इन प्रशासनिक शक्तियों में निंदा पत्र जारी करना, कर्मियों के वेतन एवं भत्तों में कटौती, वेतन एवं भत्तों की वसूली, सेना अधिनियम 1950 के तहत निर्वाह भत्ता प्रदान करना आदि शामिल है।
इसमें कहा गया है कि समिति को शत प्रतिशत विश्वास है कि विधेयक के अमल में आने के अनेक लाभ होंगे जिसमें प्रभावी अनुशासन एवं कार्य दक्षता बनाए रखना, कर्मियों को अनुशासनात्मक कार्रवाई के तहत उनकी मूल सेना इकाइयों में वापस भेजने की व्यवस्था समाप्ता करना, कदाचार से निपटन, समय की बचत आदि शामिल है।
रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘ समिति प्रस्तावित कानून से पूरी तरह से सहमत है।’’
इसमें कहा गया है, ‘‘ समिति विधेयक के उपबंधों से सहमत होते हुए स्पष्ट रूप से यह सिफारिश करती है कि विधेयक को बिना किसी संशोधन के पारित किया जाए और समिति की टिप्पणियों/सिफारिशों पर विचार किया जाए।
दीपक
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