विदेश की खबरें | पाकिस्तान ने 2017 फैजाबाद धरने की जांच के लिए नया आयोग बनाया, उच्चतम न्यायालय ने समर्थन किया
श्रीलंका के प्रधानमंत्री दिनेश गुणवर्धने

इस्लामाबाद, 15 नवंबर पाकिस्तान सरकार ने बुधवार को उच्चतम न्यायालय को सूचित किया कि उसने एक कट्टरपंथी धार्मिक समूह द्वारा 2017 में दिए गए धरने की जांच के लिए नए तथ्यान्वेषी आयोग का गठन किया है, जो पहले से भी अधिक शक्तिशाली है। इस कट्टरपंथी धार्मिक समूह के धरने के कारण इस्लामाबाद और रावलपिंडी में व्यापक व्यवधान हुआ था।

शीर्ष अदालत ने इस महीने की शुरुआत में इस मुद्दे की जांच के लिए गठित एक समिति को ‘‘ढकोसला’’ कहकर खारिज कर दिया था। उच्चतम न्यायालय ने नए आयोग का समर्थन किया और यह भी कहा कि आयोग के पास ‘‘किसी को भी जांच के लिए बुलाने का अधिकार होगा... किसी को भी छूट नहीं होगी।’’

यह घोषणा उस वक्त की गई जब प्रधान न्यायाधीश काजी फैज ईसा की अध्यक्षता वाली शीर्ष अदालत की तीन सदस्यीय पीठ ने अदालत के 2019 के फैसले के खिलाफ दायर समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई की, जिसे अब फैजाबाद धरना मामले के रूप में जाना जाता है।

शीर्ष अदालत ने एक नवंबर को मामले की सुनवाई करते हुए तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) के 20 दिवसीय धरने की जांच के लिए पिछले तथ्यान्वेषी आयोग को खारिज कर दिया था।

बुधवार की कार्यवाही के दौरान अटॉर्नी जनरल मंसूर उस्मान अवान ने पीठ को सूचित किया कि सरकार ने धरने की जांच के लिए एक नया तथ्यान्वेषी आयोग बनाया है, जिसमें तीन सदस्य शामिल हैं।

नए तथ्यान्वेषी आयोग को धरने के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों की जांच करने और उनकी पहचान करने तथा उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की सिफारिश करने का काम सौंपा गया है। नयी टीम दो महीने के भीतर संघीय सरकार को एक रिपोर्ट में अपने निष्कर्ष सौंपेगी।

न्यायमूर्ति ईसा ने टिप्पणी की कि नवगठित तथ्यान्वेषी आयोग को पूर्व प्रधानमंत्री, पूर्व सेना प्रमुख और तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश को जांच के लिए बुलाने का अधिकार है। उन्होंने कहा, ‘‘आयोग किसी को भी जांच के लिए बुला सकता है... किसी को भी छूट नहीं होगी।’’

बाद में पीठ ने यह कहकर मामले की सुनवाई स्थगित कर दी कि इसकी सुनवाई दो महीने बाद की जायेगी।

एक नवंबर को प्रधान न्यायाधीश ने पूर्व समिति की जांच को ‘‘ढकोसला’’ करार दिया था और कहा था कि इसमें ‘‘वास्तविक चीज’’ गायब है और ‘‘यह समिति अवैध है’’। उन्होंने सवाल किया कि जांच आयोग अधिनियम के तहत जांच क्यों नहीं की गई और सरकार को एक और समिति बनाने का निर्देश दिया।

टीएलपी ने आरोप लगाया था कि सरकार द्वारा सांसदों के लिए शपथ में बदलाव किए गए थे और दावा किया गया था कि शपथ में संशोधन एक ‘‘लिपिकीय त्रुटि’’ थी और बाद में संसद के एक अधिनियम के माध्यम से इसे ठीक किया गया था।

समूह ने विरोध जारी रखा और उसके 20 दिनों के धरने से जनता को भारी असुविधा हुई क्योंकि इससे इस्लामाबाद और रावलपिंडी में जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया और मामला शीर्ष अदालत में पहुंच गया।

तत्कालीन न्यायाधीश काजी फैज ईसा जो अब प्रधान न्यायाधीश हैं, ने धरना मामले में अपने 2019 के फैसले में अन्य कदमों के अलावा विरोध के पीछे का असली कारण जानने के लिए एक जांच समिति बनाने का आदेश दिया था।

सुरभि अविनाश

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