देश की खबरें | नियम का उल्लंघन कर अंग प्रत्यारोपण : केरल में निजी अस्पताल, आठ चिकित्सकों पर कार्रवाई होगी

कोच्चि (केरल), 14 जून केरल की एक अदालत ने 2009 में एक दुर्घटना पीड़ित के अंग अनधिकृत रूप से निकालने के अपराध के लिए यहां के जाने माने एक निजी अस्पताल और आठ चिकित्सकों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू करने का फैसला किया है।

न्यायिक प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट एल्डोस मैथ्यू का यह फैसला एक चिकित्सक की शिकायत पर सुनवाई के दौरान आया है। चिकित्सक का आरोप है कि दुर्घटना के शिकार पीड़ित को उचित उपचार देने से मना किया गया और उसके अंगों का, नियमों का उल्लंघन कर तथा उचित प्रक्रिया का पालन किए बगैर एक विदेशी नागरिक में प्रत्यारोपण किया गया।

अदालत ने कहा कि उसके विचार में ‘‘प्रथम दृष्टया मामला बनता है और सभी अभियुक्तों के खिलाफ मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम, 1994 के तहत अपराधों के संबंध में कार्यवाही को लेकर पर्याप्त आधार है।’’

अदालत ने अपने 29 मई के आदेश में कहा, ‘‘शिकायतकर्ता ने अधिनियम के तहत आवश्यक सभी नियमों का अनुपालन किया है। इसलिए मामला संज्ञान में लिया गया। इसलिए यह निर्देश दिया जाता है कि सभी अभियुक्तों को समन जारी किया जाए।’’

आरोपियों में निजी अस्पताल भी शामिल है जहां पीड़ित की मौत हुई। इसके अलावा प्रत्यारोपण टीम में मौजूद चिकित्सक तथा उन दो अस्पतालों में पीड़ित का परीक्षण करने वाला न्यूरोसर्जन शामिल हैं, जहां दुर्घटना के बाद उसे ले जाया गया था।

मजिस्ट्रेट ने कहा कि विभिन्न अदालती फैसलों, संबंधित कानूनों और उनके समक्ष प्रस्तुत साक्ष्य पर विचार करने के बाद यह पता चला है कि अगर दुर्घटना के बाद पीड़ित के कपाल गुहा (क्रेनियल कैविटी) में एकत्र हुआ खून निकाल लिया जाता तो उसकी जान बच सकती थी।

अदालत ने कहा, ‘‘लेकिन उसकी कपाल गुहा से खून निकालने का कोई प्रयास नहीं किया गया। जबकि पीड़ित का दो अस्पतालों में न्यूरोसर्जन ने परीक्षण किया जहां उसका उपचार किया गया था।’’

दुर्घटना के तुरंत बाद पीड़ित को यहां निकट के कोठामंगलम स्थित मार बेसीलियस अस्पताल में भर्ती कराया गया और फिर एर्णाकुलम में लेकशोर अस्पताल ले जाया गया।

अदालत ने यह भी कहा कि न्यूरोसर्जरी या खून निकालने की योजना बनाने से पहले लेकशोर अस्पताल ने पीड़ित के एचआईवी टेस्ट भी किए थे।

अदालत ने कहा, ‘‘यहां तक कि ‘ब्रेन डेथ’ घोषित करने से पहले प्रत्यारोपण की टीम ने मरीज से मुलाकात की और उसके जिगर (लीवर) की कार्यप्रणाली का परीक्षण किया गया।’’

शिकायत में कहा गया है कि मृत्यु प्रमाणपत्र तय नियमों के अनुसार नहीं था और इस पर हस्ताक्षर करने वाले कुछ चिकित्सक नियमों के अनुसार ऐसा करने के लिए अधिकृत नहीं थे।

अदालत ने यह भी कहा कि यहां तक कि ‘ब्रेन डेड’ घोषित करने के लिए आवश्यक जांच ‘एपनिया टेस्ट’ भी नहीं किया गया था।

अदालत ने कहा कि पीड़ित का जिगर आंतरिक प्राधिकरण समिति की मंजूरी के बिना विदेशी नागरिक में प्रत्यारोपित किया गया और मलेशियाई दूतावास के प्रमाणपत्र में अंग लेने वाले मरीज की पत्नी को दानदाता बताया गया जो ‘‘संदेहास्पद’’ है।

शिकायतकर्ता डॉ. एस गणपति ने भी इन सभी आधारों का हवाला दिया था, जिन्होंने दावा किया था कि पीड़ित के रिश्तेदारों को विश्वास दिलाया गया था कि वह ‘ब्रेन डेड’ है और इस तरह उसके महत्वपूर्ण अंगों को दान करने के लिए प्रेरित किया गया।

पीड़ित अबिन वी. जे. 29 नवंबर, 2009 को एक दुर्घटना का शिकार हुआ था, जब उसकी मोटरसाइकिल बिजली के एक खंभे से टकरा गई थी और उसे सिर में चोटें आई थीं।

शिकायत के अनुसार, एक दिसंबर, 2009 को उसे ‘ब्रेन डेड’ घोषित कर दिया गया और उसके महत्वपूर्ण अंगों को निकाल लिया गया तथा उसका जिगर एक विदेशी नागरिक में प्रत्यारोपित कर दिया गया।

शिकायतकर्ता डॉ गणपति केरल के कोल्लम जिले में रहते हैं। उन्हें इस घटना के बारे में पता चला और समाचार पत्रों में भी खबरें आईं। जांच में पाया गया कि नियमों का उल्लंघन कर अंग प्रत्यारोपण किया गया तथा मृतक के अभिभावकों को गुमराह कर उनकी अंग प्रत्यारोपण के लिए सहमति ली गई।

डॉ गणपति ने एक टीवी चैनल को बताया कि अदालत द्वारा मामले में जांच के आदेश दिए जाने के बाद इसे बाधित करने के कई प्रयास हुए और कहा गया कि अस्पताल की ओर से या डॉक्टरों की ओर से कुछ भी गलत नहीं किया गया।

उन्होंने बताया ‘‘इसी बीच, रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने वाले डॉक्टरों में से एक ने कहा कि वह बैठक में थी ही नहीं और उसके फर्जी हस्ताक्षर किए गए हैं। तब मैंने मामले के मेडिकल रिकॉर्ड लगातार खंगालना शुरू किया।’’

उन्होंने आरोप लगाया कि जब मरीज को मार बेसीलियस अस्पताल से लेकशोर रेफर किया गया, उसी समय उसकी जान बचाने के बजाय उसके अंग प्रत्यारोपण की तैयारियां शुरू कर दी गई थीं। ‘‘जबकि उसकी जान बचाई जा सकती थी।’’

डॉ गणपति ने दावा किया ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है कि अस्पताल प्रबंधन को इसकी जानकारी न हो ? अस्पताल प्रबंधन की मंजूरी के बिना यह नहीं हो सकता था।’’

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