देश की खबरें | मुजफ्फरपुर आश्रय गृह मामला : अदालत ने सीबीआई से ब्रजेश ठाकुर की अपील पर जवाब मांगा
एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, 22 जुलाई दिल्ली उच्च न्यायालय ने बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के एक आश्रय गृह में लड़कियों के यौन उत्पीड़न के जुर्म में दोषी ठहराये गये ब्रजेश ठाकुर की अपील पर बुधवार को सीबीआई को नोटिस जारी किया। निचली अदालत ने इस मामले में ब्रजेश ठाकुर को मृत्यु होने तक जेल में रहने की सजा सुनाई है।

न्यायमूर्ति विपिन सांघी और न्यायमू्ति रजनीश भटनागर की पीठ ने निचली अदालत के 20 जनवरी और 11 फरवरी के फैसले को रद्द करने के अनुरोध वाली ब्रजेश ठाकुर की अपील पर सीबीआई को नोटिस जारी किया। सीबीआई को 25 अगस्त से पहले इस नोटिस का जवाब देना है।

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निचली अदालत ने 20 जनवरी को अपने फैसले में ठाकुर को इस मामले में दोषी ठहराया था और 11 फरवरी को उसे इस अपराध के लिये सजा सुनाई गयी थी।

पीठ ने मामले में अगली सुनवाई 25 अगस्त को तय की है।

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उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘अपील स्वीकार की जाती है। सीबीआई अगली तारीख से पहले स्थिति रिपोर्ट या जवाब दायर करे।” अदालत ने इस अपील को पहले से लंबित बाल कल्याण समिति के तत्कालीन प्रमुख एवं सह-दोषी दिलिप वर्मा की अपील के साथ सूचीबद्ध कर दिया।

निचली अदालत ने मामले में वर्मा को भी ताउम्र कैद में रहने की सजा सुनाई है।

उच्च न्यायालय ने सीबीआई से ठाकुर की उस याचिका पर भी जवाब मांगा है जिसमें उसने निचली अदालत द्वारा उसपर लगाए गए 32.20 लाख रुपये के जुर्माने पर रोक लगाने का अनुरोध किया है। यह याचिका अधिवक्ता प्रमोद कुमार दुबे के माध्यम से दायर की गई है।

दिल्ली के साकेत अदालत परिसर में स्थित एक निचली अदालत ने ठाकुर को “मृत्यु तक कठोर उम्रकैद की सजा” सुनाई थी और उसपर 32.20 लाख रुपये का जुर्माना यह कहते हुए लगाया था कि वह “सावधानीपूर्व रची गई” साजिश का मास्टरमाइंड था और उसने “अत्यधिक विकृति दिखाई।”

बिहार पीपुल्स पार्टी (बीपीपी) के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ चुके ठाकुर के अलावा, निचली अदालत ने मामले में कई अन्य लोगों को भी उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

ठाकुर ने अपनी अपील में तर्क दिया है कि साकेत के विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो) द्वारा मुकदमा ‘‘जल्दबाजी” में पूरा किया गया जो कि संविधान के तहत प्रदत्त मुक्त एवं निष्पक्ष मुकदमे के उसके अधिकार का हनन है।

उसने दावा किया कि उसके आवेदनों एवं दलीलों को उचित ढंग से न्यायिक विवेक का प्रयोग किए बिना मशीनी तरीके से खारिज किया गया और इस तरह से किया गया कि मुकदमा किसी तरह पूरा हो जाए।

वकील निशांक मट्टू, अनुराग आंदले और श्रीद कृष्णा के जरिए दायर अपील में दावा किया गया कि दोषी ठहराए जाने और सजा सुनाए जाने का आदेश निचली अदालत ने पक्षपातपूर्ण एवं मशीनी तरीके से सुनाया गया जो ठाकुर के खिलाफ लगे आरोपों की वीभत्सता और लोगों की अवधारणा से प्रभावित था।

अपील में यह मुद्दा भी उठाया गया कि बलात्कार से संबंधित मामले में आरोपी की क्षमता की जांच एक मूल तथ्य है जिसे अभियोजन पक्ष को साबित करना होता है। अपील में कहा गया है कि बिहार पुलिस और सीबीआई ने ब्रजेश ठाकुर की इस क्षमता जांच नहीं कराई।

इसमें तर्क दिया गया, “निचली अदालत यह समझने में विफल रही कि कानून के अंदर ऐसा कोई अनुमान नहीं है कि एक व्यक्ति जो 50 साल से ऊपर का है और हाई ब्लड शुगर से पीड़ित है, वह क्षमतावान होगा ही...आरोपी की क्षमता स्थापित किए बिना खासकर जिसकी उम्र 50 साल है ऊपर है उसे बलात्कार का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।”

इसमें आरोप लगाया गया, “विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो), साकेत अपीलकर्ता (ठाकर) को दोषी ठहराते वक्त कानूनी रूप से अस्वीकार्य साक्ष्यों पर निर्भर रहे और संभावित स्पस्टीकरण देकर अभियोजन पक्ष के गवाह की भूमिका निभाई जिन्हें न तो अभियोजन के गवाहों ने कभी कहा और न ही उन्हें साक्ष्य में रिकॉर्ड किया गया तथा न ही अंतिम दलील के दौरान अभियोजन ने उनपर बहस की।”

अपील में दावा किया गया कि निचली अदालत का फैसला, “अवैध, गलत, विकृत और रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्यों के विपरीत है” और इसलिए इसे निरस्त किया जाना चाहिए।

निचली अदालत ने 20 जनवरी को ठाकुर को यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (पॉक्सो) कानून की धारा छह और भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत बलात्कार और सामूहिक बलात्कार सहित विभिन्न अपराधों का दोषी ठहराया था।

ब्रजेश ठाकुर के अलावा, इसने बाल कल्याण समिति के तत्कालीन प्रमुख, दिलिप वर्मा, जिला बाल संरक्षण इकाई के बाल संरक्षण अधिकारी रवि रोशन, बाल कल्याण समिति के सदस्य विकास कुमार, गुड्डु विजय, कुमार तिवारी, गुड्डु पटेल, किशन कुमार और रामानुज ठाकुर को ताउम्र कैद की सजा सुनाई थी।

इसने तीन महिलाओं - मीनू देवी, किरण कुमारी और शाइस्ता प्रवीण को बलात्कार के लिए उकसाने के दोष में उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

निचली अदालत ने रमा शंकर, अश्वनी, मंजू देवी, चंदा देवी, नेहा कुमारी और हेमा मसीह को 10 साल कैद तथा इंदु कुमारी को तीन साल कैद की सजा सुनाई।

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