मुंबई, 28 जून हिंदी सिनेमा में 72 प्रतिशत किरदार उन लोगों द्वारा अदा किये जाते हैं जो जन्म से पुरुष हैं और इसी पहचान के साथ रहते हैं, वहीं 26 प्रतिशत भूमिकाएं महिलाएं निभाती हैं जो जन्म से इसी लैंगिक पहचान के साथ रहती हैं। मुंबई फिल्म उद्योग में लैंगिक पहचान से संबंधित एक नये अध्ययन में यह दावा किया गया।
इसमें कहा गया कि हिंदी सिनेमा में महज दो प्रतिशत स्थान ऐसे लोगों को मिलता है जो अपनी अलग लैंगिक पहचान बनाते हैं या समलैंगिक हैं। फिल्मों में महज 0.5 प्रतिशत किरदार दिव्यांग दिखाये जाते हैं और वे भी सहानुभूति बटोरने या हास्य पैदा करने के लिए फिल्मों का हिस्सा बनते हैं।
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस (टिस), मुंबई के तहत संचालित स्कूल ऑफ मीडिया एंड कल्चरल स्टडीज (एसएमसीएस) द्वारा कराये गये एक अध्ययन में यह बात सामने आई।
एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार मुंबई स्थित अमेरिकी वाणिज्य दूतावास से प्राप्त अनुदान से यह अध्ययन किया गया जिसका शीर्षक ‘लाइट, कैमरा, एंड टाइम फॉर एक्शन: रिकास्टिंग जेंडर इक्वलिटी कम्प्लायंट हिंदी सिनेमा’ है।
यह रिपोर्ट बुधवार को टिस की निदेशक शालिनी भरत और अमेरिकी महावाणिज्य दूत माइक हैंकी ने अभिनेत्रियों विद्या बालन, नंदिता दास, फिल्म निर्माता गुणीत मोंगा और प्रोड्यूसर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अध्यक्ष शिवाशीष सरकार की मौजूदगी में जारी की।
रिपोर्ट के अनुसार एसएमसीएस-टिस ने 2019 की 25 अधिक कमाई वाली हिंदी फिल्मों का गहराई से और एक-एक शॉट का विश्लेषण किया। उन 10 फिल्मों का भी विश्लेषण किया गया जो महिलाओं ने या इस रूप में लैंगिक पहचान बदलने वाली हस्तियों ने 2012 से 2019 के बीच बनाई हैं और/अथवा इनमें महिलाओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार बॉक्स ऑफिस पर सफल रहने वाली केवल 36 प्रतिशत फिल्मों ने ‘बैचडेल परीक्षा’ पास की।
यह परीक्षा फिल्मों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व का आकलन करती है।
इसमें कहा गया है कि पर्दे पर और पर्दे के पीछे लैंगिक अंतराल को पाटने के लिए अधिक समझदारी वाली और स्पष्ट रणनीति जरूरी है।
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