देश की खबरें | बाटागुर धोंगोका नामक कछुओं की संख्या में 80 प्रतिशत की गिरावट के लिए मनुष्य जिम्मेदार

नयी दिल्ली, 26 अप्रैल कभी गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों में बड़ी संख्या में पाए जाने वाले ‘बाटागुर धोंगोका’ नामक कछुए अब काफी हद तक लुप्त हो चुके हैं। सरकारी खर्च पर किए गए एक अध्ययन में पता चला है कि आधी सदी में इनकी आबादी में 80 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है, जिसका मुख्य कारण ठिकानों का कम होना, अवैध व्यापार और प्रदूषण है।

राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के समर्थन से किए गए इस अध्ययन से पता चला है कि बचे हुए कछुओं में आनुवंशिक विविधता बहुत कम है, जिससे इनके दीर्घकालिक अस्तित्व को लेकर चिंता उत्पन्न हो गई है।

विज्ञान पर आधारित संरक्षण प्रयासों की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करते हुए, अध्ययन में दीर्घकालिक आनुवंशिक निगरानी, अवैध शिकार के खिलाफ सख्त कार्रवाई और विशेष रूप से राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में इन कछुओं के ठिकानों को बहाल करने का आह्वान किया गया है, जहां ये काफी अधिक संख्या में पाए जाते हैं।

यह अभयारण्य राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बिंदु स्थल के पास चंबल नदी पर स्थित है।

अध्ययन में कहा गया है, "बाटागुर धोंगोका नामक इन कछुओं की आबादी में मछली पकड़ने के जाल में उलझने, नदी के प्रवाह की गतिशीलता, जल प्रदूषण और अवैध व्यापार के हानिकारक प्रभावों आदि के कारण काफी गिरावट आई है।"

भारतीय वन्यजीव संस्थान के शोधकर्ताओं ने दो कछुआ बचाव एवं पुनर्वास केंद्रों - वाराणसी में टीआरआरसी और नरौरा में जीएआरआरसी - में रखे गए कछुओं के आनुवंशिक नमूनों का विश्लेषण किया।

‘माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए’ और ‘माइक्रोसैटेलाइट मार्करों’ का उपयोग करते हुए पिछले साल किए गए अध्ययन में पता चला कि जनसंख्या में आनुवंशिक विविधता का स्तर कम है और यह खतरे के कगार पर खड़ी किसी भी प्रजाति के लिए एक चेतावनी संकेत है।

इस प्रजाति के कछुओं की प्रभावी सुरक्षा व संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए, सरकार ने इसे वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-प्रथम में शामिल करके एक सक्रिय कदम उठाया। अधिनियम को 2022 में संशोधित किया गया था।

इस अनुसूची के अंतर्गत आने वाली प्रजातियों को उच्चतम स्तर की सुरक्षा प्राप्त है।

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