देश की खबरें | कानूनी विशेषज्ञों ने न्यायपालिका पर उपराष्ट्रपति धनखड़ की टिप्पणी की निंदा की

नयी दिल्ली, 12 जनवरी कई विधि विशेषज्ञों ने उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की उस टिप्पणी की कड़ी निंदा की है, जिसमें उन्होंने 1973 के केशवानंद भारती मामले के उस ऐतिहासिक फैसले पर सवाल खड़े किये थे, जिसमें कहा गया था कि संविधान की मूल संरचना अपरिवर्तनीय है।

उस फैसले में कहा गया था कि संविधान सर्वोच्च है, संसद नहीं।

जयपुर में एक समारोह में उपराष्ट्रपति ने न्यायपालिका की निंदा करते हुए कहा था कि न्यायिक मंचों से "खुद को श्रेष्ठ घोषित करना और सार्वजनिक दिखावा" अच्छा नहीं है और इन संस्थानों को पता होना चाहिए कि खुद किस तरह का व्यवहार करना है।

उन्होंने शीर्ष अदालत द्वारा 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) को निरस्त कर दिये जाने की भी आलोचना की थी।

उपराष्ट्रपति की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कहा कि दिखावे का कोई सवाल ही नहीं है, क्योंकि शीर्ष अदालत दलीलों के आधार पर मामले का फैसला करती है।

सिंह ने कहा, ‘‘मैं वास्तव में समझ नहीं पा रहा हूं कि वह क्या कह रहे हैं। क्या वह कह रहे हैं कि न्याय वितरण बंद होना चाहिए, या न्यायाधीशों को सरकार के विपरीत निर्णय नहीं देना चाहिए? जहां तक ​​न्यायपालिका के खुद को श्रेष्ठ दिखाने का संबंध है, यह सवाल ही पैदा नहीं होता, क्योंकि वे (न्यायाधीश) दलीलों के आधार पर फैसला करते हैं तथा न्यायिक समीक्षा हमारी प्रणाली का अभिन्न हिस्सा है।"

प्रसिद्ध वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि एक संवैधानिक गणतंत्र में संसद नहीं, संविधान सर्वोच्च है। उन्होंने राज्यसभा के सभापति को संविधान का अध्ययन करने की भी सलाह दी।

भूषण ने कहा, "मौजूदा सरकार बुनियादी ढांचे के सिद्धांत से नाखुश है, क्योंकि वह हमारे लोकतंत्र और राजनीति में ढांचागत परिवर्तन करना चाहती है, तथा उसमें कोई बाधा नहीं चाहती है। यह एक ऐसी सरकार है जो हर लोकतांत्रिक संस्था को नष्ट कर रही है और धर्मनिरपेक्षता को भी समाप्त करना चाहती है।"

उन्होंने कहा कि बुनियादी ढांचे का सिद्धांत 50 साल पुराना है और उसके बाद किसी भी गंभीर न्यायविद, वकील ने कभी इस पर सवाल नहीं उठाया तथा यह समय की कसौटी पर खरा उतरा है।

वरिष्ठ अधिवक्ता पी चिदंबरम ने कहा कि धनखड़ का यह कहना गलत है कि संसद सर्वोच्च है और उपराष्ट्रपति के विचारों को प्रत्येक संविधान-प्रेमी नागरिक को आने वाले खतरों के प्रति चेतावनी के तौर पर लेना चाहिए।

वरिष्ठ अधिवक्ता और संविधान विशेषज्ञ राकेश द्विवेदी ने कहा कि भारत में न्यायाधीश ऐसी टिप्पणियां सुनने के आदी हैं और स्वर्गीय इंदिरा गांधी के समय से ही न्यायपालिका पर हमले होते रहे हैं।

द्विवेदी ने कहा कि उपराष्ट्रपति के अपने विचार हो सकते हैं, लेकिन वे किसी भी तरह से न्यायपालिका पर बाध्यकारी नहीं हैं।

उन्होंने कहा, "सोशल मीडिया पर हर दिन बहुत सी बातें कही जा रही हैं। न्यायाधीशों को इससे सीखना होगा। वे इस सबका सामना (खुद) कर सकते हैं। यह वास्तव में लंबे समय से लोकतंत्र का हिस्सा बन गया है। मैं इसे (उपराष्ट्रपति की टिप्पणी को) या और जिस तरीके से ये बातें कही गयी हैं, उसे सही नहीं ठहरा रहा हूं।"

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