नयी दिल्ली, 31 जनवरी संसद में मंगलवार को पेश 2022-23 के आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि पर्याप्त और किफायती वित्तीय मदद का अभाव जलवायु परिवर्तन से निपटने की भारतीय गतिविधियों में बाधा बना हुआ है।
इसमें कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की देश की गतिविधियां अभी तक बड़े पैमाने पर केवल घरेलू स्रोतों से वित्तपोषित हैं, जिनमें सरकारी बजटीय सहयोग, बाजार तंत्र का मिश्रण, वित्तीय साधन और नीतिगत हस्तक्षेप शामिल हैं।
सर्वेक्षण में कहा गया है कि आवश्यक निवेश संबंधी कई अनुमान भारत द्वारा तैयार की गई ‘दीर्घकालिक निम्न ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन विकास रणनीतियां’ (एलटी-एलईडीएस) रिपोर्ट में बताए गए हैं, लेकिन यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये सभी कई खरबों डॉलर की आवश्यकता की ओर इशारा करते हैं।
इसमें कहा गया है कि भारत वैश्विक स्तर पर अत्यधिक उत्सर्जन के लिए अपेक्षाकृत कम जिम्मेदार है, लेकिन वह 2070 तक निवल-शून्य उत्सर्जन लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता के साथ विभिन्न उपायों को अपनाने और कम-उत्सर्जन वाले माध्यमों से विकास का मार्ग सुनिश्चित करने की दिशा में लगातार वैश्विक नेतृत्व कर रहा है।
सर्वेक्षण में कहा गया है, ‘‘भारत की जलवायु महत्वाकांक्षाओं के लिए संसाधनों की आवश्यकता है जो जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए समर्पित हों। इसके अलावा देश के विकास संबंधी लक्ष्यों के लिए भी संसाधनों की जरूरत है।’’
इसमें कहा गया है कि सामाजिक-आर्थिक विकास के उद्देश्यों और आकांक्षाओं को खतरे में न डालते हुए जलवायु संबंधी दायित्व वित्तीय, प्रौद्योगिकी और अहम खनिजों जैसे साधनों की समय पर उपलब्धता के अनुरूप होने चाहिए।
सर्वेक्षण में कहा गया है कि भारत ने अब तक जलवायु परिवर्तन से निपटने संबंधी कार्रवाई अपने दम पर की है, लेकिन इन कदमों को और बड़े पैमाने पर उठाने की उम्मीदों के अनुसार विकासशील देशों की पहल भी बढ़नी चाहिए। इन पहलों में वित्तीय मदद, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण में सहयोग सहित कार्यान्वयन के साधन प्रदान करना शामिल है।
इसमें कहा गया है कि इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि वैश्विक जलवायु एजेंडा तभी आगे बढ़ेगा, यदि विकसित देश अपने देशों में अपने लोगों द्वारा स्वीकार्य नीतियों और व्यवहार में बदलाव के उदाहरण प्रस्तुत कर सकें। तभी विकासशील देशों की नीतियों और व्यवहार में बदलाव की सफलता की उम्मीद करना यथार्थवादी होगा।
इसमें कहा गया है कि भारत ने अपने विकास लक्ष्यों और जलवायु कार्रवाई से संबंधित उद्देश्यों को एकीकृत करके सतत विकास सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण प्रगति की है।
पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिए केंद्रित प्रयासों के महत्वपूर्ण हिस्सों के रूप में भारत में 75 रामसर स्थल हैं। इसके अलावा मैंग्रोव के संरक्षण के लिए कई विनियामक कदम उठाए गए हैं। नमामि गंगे और राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (एनआरसीपी) के माध्यम से नदी संरक्षण और कायाकल्प के प्रयास निरंतर जारी हैं।
सर्वेक्षण में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए देश द्वारा नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल, राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन एवं हरित हाइड्रोजन नीति समेत उठाए गए महत्वपूर्ण कदमों को रेखांकित किया गया।
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