मुंबई, 13 जून बंबई उच्च न्यायालय ने कहा है कि कोविड-19 से निपटने में लगे अग्रिम मोर्चे के कर्मचारियों को बिना किसी भय के अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और रोजाना बाहर निकलने की वजह से उन्हें बहिष्कृत नहीं किया जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति अमजद सईद की पीठ ने शुक्रवार को पालघर जिले के एक निवासी की याचिका को खारिज करते हुए यह बात कहीं। याचिका में ऐसे कर्मचारियों को पृथक-वास में रखने की मांग की गई थी।
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चरण भट्ट की ओर से दाखिल याचिका में काम के सिलसिले में प्रतिदिन मुंबई और पालघर के बीच यात्रा करने वाले आवश्यक सेवा के कर्मचारियों को मुंबई में अस्थाई तौर पर ठहराने की मांग की गई थी।
याचिका में कहा गया था कि अग्रिम मोर्चे के कर्मचारी मुंबई में संक्रमण की चपेट में आते हैं और वसई और विरार में अपने घरों को लौटते हैं और पालघर जिले में कोरोना वायरस संक्रमण फैलने की यह एक खास वजह बन गया है।
याचिका में कहा गया है कि ठाणे,कल्याण,डोंबीवली और नवी मुंबई में भी यही हालात हैं।
राज्य सरकार ने इस याचिका का यह कहते हुए विरोध किया था कि याचिकाकर्ता को महामारी से निपटने के लिए कार्य कर रहे आवश्यक सेवा के कर्मचारियों के प्रति ज्यादा संवेदनशील होना चाहिए।
उच्च न्यायालय ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि भयवश याचिकाकर्ता ने अदालत का रुख किया है लेकिन संकीर्ण व्यक्तिगत हित को व्यापक जन हित के लिए छोड़ा जाना चाहिए।
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