देश की खबरें | जेएनयू ने अदालत में माना, दिव्यांगों को नहीं मिल रहा निर्धारित कोटा
एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, 13 अक्टूबर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ने मंगलवार को दिल्ली उच्च न्यायालय में स्वीकार किया कि दिव्यांगों को पाठ्यक्रमों में सीट आवंटित करने की उसी मौजूदा पद्धति से कानूनी रूप से अनिवार्य पांच प्रतिशत आरक्षण नहीं दिया जा पा रहा है।

विश्वविद्यालय के वकील ने मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति प्रतीक जलान की पीठ के समक्ष स्वीकार किया कि प्रवेश प्रक्रिया पूरी होने के बाद दिव्यांगों की कुल संख्या पांच प्रतिशत नहीं है जैसा कि दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार (आरपीडब्ल्यूडी) अधिनियम के तहत प्रावधान है।

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इस पर पीठ ने कहा, ‘‘यहां तक कि आपके अनुसार प्रवेश में आप पांच प्रतिशत आरक्षण के लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाए। आरक्षण संस्थान के स्तर पर दिया जाता है न कि पाठ्यक्रमवार।’’

अदालत ने पूछा, ‘‘क्या आपने प्राशनिक स्तर पर आवंटन किया जिसकी वजह से प्रवेश में पांच प्रतिशत आरक्षण के लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सका? अगर आपको इस कानून के पीछे के उद्देश्य का अहसास नहीं है तो हमें समस्या है।’’

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पीठ ने आगे कहा, ‘‘आप सीटों के आवंटन में ऐसे कांटछांट नहीं दिखा सकते जिससे आप दिव्यांगों को केवल चार या साढे चार प्रतिशत आरक्षण देने का लक्ष्य हासिल कर सके जबकि यह पांच प्रतिशत या इससे अधिक होना चाहिए। अंतत: सभी सीटों को भरने के बाद आपको यह देखना होगा कि दिव्यांगों को पांच प्रतिशत आरक्षण मिले।’’

उल्लेखनीय है कि जुलाई में जेएनयू ने अदालत से कहा था कि उसने दिव्यंगों को पांच प्रतिशत अनिवार्य आरक्षण देने के नियम का कभी उल्लंघन नहीं किया और अकादमिक वर्ष 2020-21 में वह सभी पाठ्यक्रमों में दिव्यांगों को आरक्षण देने के लिए प्रतिबद्ध है।

उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायालय जावेद आबिदी फांउडेशन की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा है जिसमें दावा किया गया है कि जेएनयू ने शैक्षणिक सत्र 2020-21 में दिव्यांगों को पांच प्रतिशत से कम सीटों पर प्रवेश दिया है।

सुनवाई के दौरान जेएनयू की ओर से पेश अधिवक्ता मोनिका अरोड़ा ने कहा कि मामले को कार्यकारी परिषद के समक्ष रखा जाएगा ताकि वह सीटों के आवंटन के लिए बेहतर पद्धति बना सके और पांच प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित किया जा सके। साथ ही उन्होंने याचिका को निस्तारित करने का अनुरोध करते हुए कहा कि यह मुद्दा भविष्य में विचार के लिए छोड़ दिया जाए।

अदालत हालांकि, इसपर सहमत नहीं हुई और कहा, ‘‘हम निश्चित खाका जानना चाहते हैं कि कैसे आप प्रवेश में निर्धारित आरक्षण सुनिश्चित करेंगे और सीट आवंटन केवल कागज पर नहीं होगा।’’

अब इस मामले पर छह नवंबर को सुनवाई होगी।

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