जरुरी जानकारी | आईबीसी का मकसद कर्जदार कंपनी को परिचालन में बनाए रखना, परिसमापन अंतिम रास्ता : न्यायालय

नयी दिल्ली, 15 सितंबर उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) का मुख्य उद्देश्य कर्जदार कंपनी को खड़ा करना और उसने फिर परिचालन में लाना है। कर्जदार कंपनी को फिर से परिचालन में लाने के पूरे प्रयास होने चाहिए और परिसमापन अंतिम विकल्प या रास्ता होना चाहिए।

शीर्ष अदालत ने चेन्नई के एक होटल के पूर्व कर्मचारी की याचिका को खारिज करते हुए यह बात कही। इस कर्मचारी ने ऋणदाताओं की समिति (सीओसी) द्वारा कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) को वापस लेने के प्रस्ताव पर आपत्ति जताते हुए राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) के आदेश को चुनौती दी थी। एनसीएलटी ने इस मामले में सीआईआरपी को वापस लेने की अनुमति दी थी।

इससे पहले उच्चतम न्यायालय ने दो न्यायाधीशों की पीठ ने 13 सितंबर को व्यवस्था दी थी कि सीओसी द्वारा मंजूर समाधान योजना को एनसीएलटी को सौंपने के बाद उसे वापस नहीं लिया जा सकता है और न ही उसमें संशोधन किया जा सकता है।

न्यायमूर्ति एल एन राव, न्यायमूर्ति बी आर गवई तथा न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना की पीठ ने आईबीसी की धारा 12ए का उल्लेख करते हुए कहा कि एनसीएलटी को धारा 7 या धारा 9 या धारा 10 के तहत दायर आवेदन वापस लेने का अधिकार है, लेकिन इसके लिए सीओसी के 90 प्रतिशत वोटिंग शेयर जरूरी है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि आईबीसी का मुख्य उद्देश्य कर्ज ले रखे कॉरपोरेट को फिर खड़ा करना और उसे परिचालन में बनाए रखना है।

पीठ ने कहा कि प्रत्येक प्रयास संबंधित कंपनी को परिचालन में बनाए रखना होना चाहिए। परिसमापन अंतिम रास्ता है।

अजय

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