देश की खबरें | ई निगरानी पर गृह मंत्रालय ने अदालत में कहा: गोपनीय सूचना के लिए न्यूनतम आंकड़ा रखा जाता है

नयी दिल्ली, 13 सितंबर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय में कहा है कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से होने वाली बातचीत को कानून सम्मत ढंग से पकड़ा जाना बहुत ही गोपनीय दस्तावेज की श्रेणी में आता है तथा ऐसी गोपनीय सूचना के लिए न्यूनतम आंकड़ा रखा जाता है।

राज्य प्रायोजित इलेक्ट्रॉनिक निगरानी का सूचना के अधिकार कानून के तहत खुलासा करने की मांग से संबंधित याचिका पर गृह मंत्रालय ने कहा कि साइबर एवं सूचना सुरक्षा संभाग कानून सम्मत इस निगरानी का कोई सांख्यिकी आंकड़ा नहीं रखता है क्योंकि ऐसे रिकॉर्ड की किसी क्रियात्मक उद्देश्य के लिए जरूरत नहीं रह जाती है।

याचिका को खारिज किए जाने की मांग करते हुए इसने कहा कि संबंधित कानून एवं नियम लोगों के सामने हैं तथा याचिकाकर्ता अपार गुप्ता को यह अवश्य पता होना चाहिए कि कानून सम्मत ढंग से पकड़ी गई इलेक्ट्रॉनिक वार्ता के सभी रिकॉर्ड को गृह मंत्रालय समीक्षा समिति के निर्देश की समीक्षा के बाद और यदि क्रियात्मक जरूरत के लिए उसकी आवश्यकता न हो तो, हर छह माह में नष्ट कर देता है।

गृह मंत्रालय ने कहा कि यदि देश की संप्रभुता एवं एकता के लिए, राज्य की सुरक्षा के लिए, कानून व्यवस्था के लिए जरूरत महसूस हो तो सक्षम प्राधिकार की उचित मंजूरी से अधिकृत कानून प्रवर्तन एजेंसियां कानून सम्मत ढंग से ऐसी वार्ता को रिकॉर्ड करती हैं। मंत्रालय ने कहा कि याचिकाकर्ता के लिए दो साल के रिकॉर्ड की आस करना तर्कसंगत नहीं है ।

मामले की अगली सुनवाई 16 अक्टूबर को होगी।

याचिकाकर्ता इंटरनेट फ्रीडम के संस्थापक और कार्यकारी निदेशक अपार गुप्ता ने आरटीआई अधिनियम के तहत छह आवेदन देकर सूचना प्रौद्योगिकी की धारा 69 के तहत दिए गए उन आदेशों का ब्योरा मांगा था जहां निश्चित अवधि में इलेक्ट्रॉनिक निगरानी की मंजूरी दी गयी।

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