नयी दिल्ली, 10 अप्रैल गुजरात सरकार ने 2002 से 2006 तक के कथित फर्जी मुठभेड़ों से जुड़े एक मामले में याचिकाकर्ताओं के साथ सामग्री साझा करने पर सोमवार को उच्चतम न्यायालय के समक्ष आपत्ति जताई तथा कहा कि याचिका दायर करने के उनके अधिकार और मकसद के बारे में ‘गंभीर संदेह’ हैं।
इन ‘मुठभेड़ों’ की जांच की निगरानी के लिए उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एच.एस. बेदी की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी थी।
शीर्ष अदालत वरिष्ठ पत्रकार बी.जी. वर्गीज और प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर और शबनम हाशमी द्वारा 2007 में दायर दो अलग-अलग याचिकाओं की सुनवाई कर रही थी, जिसमें कथित फर्जी मुठभेड़ों की जांच की मांग की गई थी। वर्गीज का 2014 में निधन हो गया था।
इन याचिकाओं के दाखिल होने पर न्यायमूर्ति बेदी को 2002 से 2006 तक गुजरात में 17 कथित फर्जी मुठभेड़ मामलों की जांच कर रही निगरानी समिति के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया था और उन्होंने शीर्ष अदालत को सीलबंद लिफाफे में एक रिपोर्ट सौंपी थी।
समिति ने 2019 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी और 17 मामलों में से तीन में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने की सिफारिश की थी।
राज्य की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति ए. अमानुल्लाह की पीठ को सोमवार को अवगत कराया कि याचिकाकर्ता उन राज्यों में होने वाली मुठभेड़ों के बारे में चिंतित नहीं हैं, जहां वे खुद रहते हैं, बल्कि उनका ध्यान केवल गुजरात की मुठभेड़ों पर केंद्रित है।
उन्होंने कहा, ‘‘याचिकाकर्ताओं के याचिका दायर करने के अधिकार एवं मकसद के बारे में गंभीर संदेह हैं...क्या इन दस्तावेजों को अजनबियों के साथ साझा किया जाना चाहिए?’’
शीर्ष अदालत ने 18 जनवरी को इस मामले पर सुनवाई करते हुए अपने आदेश में दर्ज किया था कि पक्षकारों के वकीलों को सुनने पर यह सामने आया है कि अंततः यह मुद्दा अब बस तीन मुठभेड़ों के इर्द-गिर्द घूमता है।
सोमवार को सुनवाई की शुरुआत में जब पीठ ने अपने पहले के आदेश का हवाला दिया तो एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि राज्य सरकार ने कुछ नहीं किया है।
मेहता ने कहा कि जांच या पूछताछ दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत की गई थी और याचिकाकर्ताओं के साथ कोई सामग्री साझा नहीं की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘‘अन्य राज्यों में रहने वाले लोगों ने मुठभेड़ों की विशेष अवधि की पहचान की है। अन्य राज्यों में भी मुठभेड़ की घटनाएं हुई हैं, लेकिन वे (याचिकाकर्ता) उनके लिए चिंतित नहीं हैं।’’
जब पीठ ने पूछा कि रिपोर्ट पर राज्य का क्या रुख है तो मेहता ने कहा, ‘‘हमें रिपोर्ट पर कुछ कहना है।’’
भूषण ने दलील दी, "इस मामले में, शीर्ष अदालत ने जांच के लिए एक पूर्व न्यायाधीश को नियुक्त किया था। रिपोर्ट कहती है कि तीन मुठभेड़ फर्जी प्रतीत होती हैं।
पीठ ने मामले की सुनवाई 12 जुलाई के लिए स्थगित करते हुए कहा, "हमें इस मुद्दे का समाधान करना होगा।"
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