नयी दिल्ली, 24 दिसंबर दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सरकारी और निजी अस्पताल यौन अपराध के पीड़ितों को इलाज से मना नहीं कर सकते। अदालत ने कहा कि इन अस्पतालों को ऐसे मामलों में मुफ्त इलाज करना चाहिए, अन्यथा आपराधिक कार्रवाई का सामना करना चाहिए।
न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह और न्यायमूर्ति अमित शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि किसी चिकित्सा प्रतिष्ठान को ऐसे पीड़ितों को आपातकालीन स्थिति में लाये जाने पर पहचान प्रमाण पर जोर नहीं देना चाहिए और यदि कोई चिकित्सक आवश्यक उपचार देने से इनकार करता है तो उसके खिलाफ पुलिस में तुरंत शिकायत दर्ज की जाएगी, क्योंकि ऐसा करना दंडनीय अपराध है।
अदालत ने बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, तेजाब हमले और यौन अपराध के नाबालिग पीड़ितों के संबंध में निर्देश पारित किए और कहा कि कानूनी अनिवार्यता के बावजूद उन्हें मुफ्त चिकित्सा उपचार प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
पीठ ने 21 दिसंबर को उपलब्ध कराए गए अपने फैसले में कहा, ‘‘जब भी इस तरह के किसी अपराध का पीड़ित/शिकार किसी चिकित्सा सुविधा केंद्र, निदान सुविधा केंद्र, निदान प्रयोगशाला, नर्सिंग होम, अस्पताल, स्वास्थ्य क्लिनिक आदि से संपर्क करता है, चाहे वह निजी हो या सार्वजनिक/सरकारी, तो ऐसे पीड़ित/शिकार को मुफ्त चिकित्सा उपचार प्रदान किए बिना वापस नहीं भेजा जाएगा।’’
उच्च न्यायालय ने कहा कि पीड़ितों को अपेक्षित उपचार से वंचित करना एक आपराधिक अपराध है और सभी चिकित्सकों, प्रशासन, अधिकारियों, नर्स, पैरामेडिकल कर्मियों आदि को इसके बारे में सूचित किया जाना चाहिए।
इस फैसले में पीड़ित की तत्काल जांच की अनुमति दी गई है और कहा गया है कि यदि स्थिति की मांग हो तो उसका एचआईवी जैसी यौन संचारित बीमारियों के लिए इलाज किया जाएगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे पीड़ितों/जीवित बचे लोगों द्वारा सरकारी या निजी अस्पतालों से मुफ्त चिकित्सा उपचार प्राप्त करना राज्य या जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण के रेफरल पर निर्भर नहीं है, क्योंकि यह दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 357सी, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 397 और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम, 2020 के नियम 6(4) के तहत एक वैधानिक अधिकार है।
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