नयी दिल्ली, दो जनवरी उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि केंद्र सरकार द्वारा जारी नोटबंदी की अधिसूचना को इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि इससे लोगों को परेशानी हुई।
केंद्र के 2016 के विमुद्रीकरण के फैसले को 4:1 के बहुमत से बरकरार रखने वाली शीर्ष अदालत की पीठ ने कहा कि व्यक्तिगत हितों की जगह व्यापक जनहित पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
सरकार के फैसले के पक्ष में मत व्यक्त करने वाले पीठ के न्यायाधीशों में न्यायमूर्ति एस ए नजीर, न्यायमूर्ति बी आर गवई, न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी रामासुब्रमण्यम भी शामिल हैं। हालांकि, न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना ने सरकार के फैसले से अहमति जताई।
पीठ ने बहुमत के फैसले में कहा, "इस तर्क में कोई दम नहीं है कि कि संबंधित अधिसूचना को इस आधार पर खारिज किया जा सकता है कि इससे व्यक्तियों/नागरिकों को कठिनाई हुई है। व्यक्तिगत हितों की जगह व्यापक जनहित पर ध्यान दिया जाना चाहिए।"
शीर्ष अदालत ने कहा कि संबंधित अधिसूचना की अवैधता पर फैसला करते हुए, उसे इस आधार की पड़ताल करनी होगी कि जिन उद्देश्यों के लिए इसे लागू किया गया था, उनका संबंध लिए गए निर्णय से है या नहीं।
इसने कहा, "अगर संबंधित अधिसूचना का उद्देश्यों को प्राप्त करने के साथ संबंध था, तो केवल इसलिए कि कुछ नागरिकों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है, यह अधिसूचना को खराब बताने का आधार नहीं होगा।"
शीर्ष अदालत ने कहा कि आठ नवंबर, 2016 की अधिसूचना के माध्यम से केंद्र द्वारा की गई कार्रवाई को 2016 के अध्यादेश द्वारा मान्य किया गया है तथा इसे 2017 के अधिनियम में लाया गया है।
पीठ ने कहा, "केंद्र सरकार संसद के प्रति जवाबदेह है और संसद बदले में देश के नागरिकों की इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है। इसलिए संसद ने कार्रवाई पर अपनी मुहर लगा दी है।"
याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने अधिसूचना को इस आधार पर चुनौती दी थी कि इससे अनेक लोगों को परेशानी हुई है।
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