देश की खबरें | दिल्ली उच्च न्यायालय ने किशोरों के प्रेम के मामले में नरम रुख अपनाने की वकालत की

नयी दिल्ली, 19 फरवरी दिल्ली उच्च न्यायालय ने किशोरों के प्रेम से जुड़े आपराधिक मामलों में ‘‘दंड’’ की जगह ‘‘विवेकपूर्ण निर्णय’’ को प्राथमिकता देने के लिए एक नरम रुख अपनाने की वकालत की और कहा कि कानून को जोर-जबरदस्ती से रहित और सहमति से बने ऐसे संबंधों को मान्यता देने के लिए अपना दायरा बढ़ाना चाहिए।

न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि सहमति से बने और गरिमापूर्ण किशोर प्रेम मानव विकास का एक स्वाभाविक हिस्सा है। उन्होंने कहा कि किशोरों को अपराधीकरण के डर के बिना अपनी भावनाओं को व्यक्त करने और संबंध बनाने की अनुमति दी जानी चाहिए।

न्यायाधीश ने 30 जनवरी को पारित और 14 फरवरी को उपलब्ध कराए गए आदेश में कहा, ‘‘प्रेम एक स्वाभाविक मानवीय अनुभूति है और किशोरों को भावनात्मक संबंध बनाने का अधिकार है। कानून को ऐसे रिश्तों को स्वीकार करने और उनका सम्मान करने के लिए अपना दायरा बढ़ाना चाहिए, जो कि सहमति से बने हों और दबाव से मुक्त हों।’’

उच्च न्यायालय ने कहा कि कानून का ध्यान प्रेम को दंडित करने के बजाय शोषण और दुर्व्यवहार को रोकने पर होना चाहिए।

अदालत ने कहा, ‘‘सहमति की कानूनी उम्र नाबालिगों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, मुझे लगता है कि किशोरों को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने और अपराधीकरण के डर के बिना संबंधों में शामिल होने की अनुमति दी जानी चाहिए।’’

आदेश में कहा गया, ‘‘मैं दृढ़ मत है कि सहमति और सम्मानजनक किशोर प्रेम मानव विकास का एक स्वाभाविक हिस्सा है।’’

उच्च न्यायालय ने यौन अपराध से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत एक मामले में सुनवाई के दौरान ये टिप्पणी की और इस मामले में आरोपी व्यक्ति को बरी करने वाले अधीनस्थ अदालत के फैसले को बरकरार रखा।

दिसंबर 2014 में लड़की के पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि उनकी नाबालिग बेटी ट्यूशन से घर नहीं लौटी है। शिकायत में लड़की के पिता ने ट्यूशन पढ़ाने वाले व्यक्ति के खिलाफ आशंका जताई थी क्योंकि वह भी अपने घर से लापता था।

जांच के बाद लड़की को वापस घर लाया गया, जबकि नाबालिग का यौन उत्पीड़न करने के आरोप में व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। घटना के वक्त लड़की की उम्र करीब 16 वर्ष थी।

उच्च न्यायालय ने व्यक्ति को बरी करने के फैसले को बरकरार रखा और अधीनस्थ अदालत के फैसले के खिलाफ राज्य की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि बरी करने का आदेश उचित और तर्कपूर्ण था और इसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं थी।

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