नयी दिल्ली, छह जुलाई दिल्ली उच्च न्यायालय ने ड्यूटी के दौरान शराब पीने तथा नशे में एक अन्य कर्मी पर बंदूक तान देने को लेकर बर्खास्त केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के एक कांस्टेबल की बर्खास्तगी को सही ठहराया और कहा कि उसके बुरे आचरण ने नरमी के लिए कोई गुजाइंश नहीं छोड़ी।
कांस्टेबल ने कहा कि उसका 14 साल का बेदाग सेवा रिकार्ड है तथा जब उसे बीमार मां को देखने जाने के लिए आकस्मिक अवकाश नहीं दिया गया तब उसने शराब पी। उसने कहा कि उसकी बर्खास्तगी मनमानापूर्ण है।
न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि एक अधिकारी को सक्षम प्राधिकार के निर्णयों के विरुद्ध विद्रोह करने की अनुमति नहीं है तथा उसका रूख ही इस बात की स्वीकारोक्ति है कि वह दबाव को झेल नहीं पाया, जबकि बल के अधिकारी से कम से कम इसकी अपेक्षा तो की ही जाती है।
न्यायमूर्ति कैत और न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने अपने आदेश में कहा, ‘‘यह केवल चिकित्सा स्थिति है, जहां याचिकाकर्ता को भारी नशे में पाया गया, बल्कि जब उसने बल के एक अन्य अधिकारी पर गोलियों से भरी बंदूक तान दी, तो बात और बिगड़ गयी, यह उसकी (संबंधित कांस्टेबल की) भारी भूल है। याचिकाकर्ता के बुरे आचरण ने उसके प्रति नरमी की गुजाइंश नहीं छोड़ी है।’’
सीआरपीएफ ने अदालत को बताया कि अक्टूबर, 2008 में पाया गया कि याचिकाकर्ता ने काफी शराब पी ली है और मांसाहार किया है। बल ने कहा कि उसके पास अज्ञात कोई व्यक्ति पका हुआ मांस टिफिन में लाया था।
सीआरपीएफ ने कहा कि बाद में जब उसपर ‘बंदिश लगायी’ गयी थी तब भी उसने फिर शराब पी ली तथा अनधिकृत रूप से गोलियों से भरी बंदूक उठा ली एवं एक अन्य कर्मी पर तान दी।
अदालत को बताया गया कि इस घटना के बाद उसके खिलाफ अनुशानात्मक कार्रवाई की गयी एवं सीआरपीएफ प्रशासन ने पाया कि वह बल में काम करने के पात्र नहीं है, ऐसे में अच्छा अनुशासन एवं सीआरपीएफ का मनोबल कायम रखने के लिए उसे सेवा से बर्खास्त करना जरूरी था।
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