नयी दिल्ली, 11 दिसंबर वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने सोमवार को कहा कि अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के केंद्र के निर्णय को बरकरार रखते हुए उच्चतम न्यायालय ने (देश के प्रथम प्रधानमंत्री)जवाहर लाल नेहरू नीत कांग्रेस सरकार द्वारा की गई ‘ऐतिहासिक’ गलती को सुधारने की मंजूरी दे दी।
अनुच्छेद 370 के तहज जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा मिला हुआ था।
संवैधानिक कानूनों के विशेषज्ञ द्विवेदी एक हस्तक्षेपकर्ता की ओर से पेश हुए थे और उन्होंने प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष अनुच्छेद 370 को हटाने के खिलाफ दायर याचिकाओं पर 16 दिनों तक चली मैराथन सुनवाई के दौरान केंद्र के फैसले का बचाव किया था।
शीर्ष अदालत ने सोमवार को सर्वसम्मति से केंद्र के निर्णय को बरकरार रखा और जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा ‘यथाशीघ्र’ बहाल करने का निर्देश दिया और वहां विधानसभा चुनाव कराने के लिए 30 सितंबर, 2024 की समय सीमा तय की।
फैसले का स्वागत करते हुए द्विवेदी ने कहा, ‘‘यह फैसला अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के निर्णय को बरकरार रखता है, और इस तरह 1947 में लॉर्ड माउंटबेटन को गवर्नर जनरल और रक्षा समिति के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करने और विवाद को संयुक्त राष्ट्र ले जाने की नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस की ऐतिहासिक गलती को सुधारने की मंजूरी देता है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘ अनुच्छेद 370 को हटाने के लिए मोदी सरकार और गृह मंत्री अमित शाह की राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता थी। उच्चतम न्यायालय ने फैसले को बरकरार रखते हुए घोषणा की कि यह प्रावधान अस्थायी था और 1957 में जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा के भंग होने के परिणामस्वरूप अनुच्छेद 370(3)समाप्त नहीं हुआ और राष्ट्रपति अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय कर सकते हैं।’’
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि फैसले में कहा गया है कि विलय के बाद जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग था और उसके पास अपनी कोई संप्रभुता नहीं थी।
उन्होंने शीर्ष अदालत के निष्कर्षों के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा,‘‘जम्मू-कश्मीर का संविधान गौण महत्व का था और अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के परिणामस्वरूप, यह स्वतः ही समाप्त हो जाता है और अस्तित्व में नहीं रहता है।’’
अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के केंद्र के फैसले का अदालत में बचाव करने वाली टीम में शामिल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सोमवार को कहा कि उच्चतम न्यायालय का फैसला इतिहास में बहुत बड़ी ‘हिमालयी संवैधानिक भूल’ को सही करने वाले फैसले के रूप में दर्ज किया जाएगा।
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