गुवाहाटी, 14 जून गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने असम के पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत को उनके कार्यकाल में उल्फा उग्रवादियों की ‘गोपनीय हत्या’ करने का आदेश देने के आरोपों से बरी करने के अपने पांच साल पुराने आदेश को बरकरार रखा है
यह टिप्पणी करते हुए कि याचिकाकर्ता अपने दावे के समर्थन में पर्याप्त सबूत पेश करने में असफल रहे हैं, मुख्य न्यायाधीश संदीप मेहता और न्यायमूर्ति मिताली ठाकुरिया की खंडपीठ ने इस संबंध में दायर हस्तक्षेप याचिका (दीवानी) खारिज कर दी है।
खंड पीठ ने कहा कि महंत के खिलाफ लगाए गए आरोप उनकी सार्वजनिक छवि को धूमिल करने के इरादे से कुछ राजनीतिक और गैर राजनीतिक पार्टियों की साजिश का हिस्सा थे।
अदालत के 12 जून के इस फैसले पर महंत की पत्नी व राज्यसभा की पूर्व सदस्य जॉयश्री गोस्वामी महंत ने कहा कि मानसिक प्रताड़ना झेलने के बाद अंतत: उनके पति को न्याय मिल ही गया। उन्होंने कहा कि उनके पति फिलहाल बीमार हैं।
जॉयश्री ने वर्षों तक उनके पति पर ‘गोपनीय हत्याओं’ के ‘झूठे और आधारहीन आरोप’ लगाने वालों की भी आलोचना की।
गौरतलब है कि राज्यसभा सदस्य अजीत कुमार भुइयां और अनंत कालिता ने तीन सितंबर, 2018 के अदालत के आदेश को चुनौती देते हुए हस्तक्षेप याचिका दायर की थी। अदालत ने अपने आदेश में उस जांच आयोग को अवैध करार दिया था जिसने महंत को मुख्यमंत्री के रूप में उनके दूसरे कार्यकाल (1996-2001) के दौरान ‘गोपनीय हत्याओं’ के लिए अभ्यारोपित किया था।
आवेदन को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने उच्च न्यायालय के पूर्व में दिए गए फैसले के 531 दिन बाद याचिका दायर की और वे इस विलंब के लिए वाजिब जवाब भी नहीं दे पाए थे।
न्यायाधीशों ने कहा, ‘‘देरी की माफी के लिए आवेदन वास्तविक दावों और आधारों पर आधारित नहीं थे और इसलिए यह स्वीकार्य नहीं है। परिणामस्वरूप याचिका खारिज की जाती है।’’
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