नयी दिल्ली, पांच जुलाई उच्चतम न्यायालय ने कथित बलात्कार एवं यौन उत्पीड़न के एक मामले में पंजाब के पूर्व विधायक एवं लोक इंसाफ पार्टी के नेता सिमरजीत सिंह बैंस को मिली जमानत में हस्तक्षेप करने से बुधवार को इनकार कर दिया।
उनके खिलाफ 2021 में लुधियाना में यह मामला दर्ज किया गया था।
न्यायमूर्ति ए. एस. बोपन्ना और न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा 25 जनवरी को बैंस को दी गई जमानत रद्द करने का अनुरोध करने वाली कथित पीड़िता की याचिका का निस्तारण कर दिया।
पीठ ने कहा, ‘‘उच्च न्यायालय ने सोच-विचार कर निर्णय लिया और अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल किया है। माफ कीजिए, हम उच्च न्यायालय के निर्णय में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।’’
कथित पीड़िता की ओर से शीर्ष न्यायालय में पेश हुए अधिवक्ता ने कहा कि उच्च न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) 166 के तहत दर्ज किये गये एक बयान को आधार बनाया, लेकिन सच्चाई यह है कि इस तरह कोई बयान दर्ज नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि आरोपी एक प्रभावशाली व्यक्ति है और जमानत देने से कथित पीड़िता की स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है।
महिला के वकील ने कहा, ‘‘उच्च न्यायालय के आदेश में यह उल्लेख किया गया है कि मेरे और मेरे परिवार के खिलाफ कई मामले दर्ज किये गये हैं। जबकि रिपोर्ट यह आई है कि विभिन्न पुलिस थानों में दर्ज किये गये ये सभी मामले झूठे हैं।’’
इसके बाद, पीठ ने महिला के वकील से कहा कि पूर्व विधायक यदि जमानत की शर्तों का पालन नहीं करते हैं तो उन्हें मिली जमानत रद्द कराने के लिए उच्च न्यायालय का रुख किया जा सकता है।
शीर्ष न्यायालय ने कहा, ‘‘हम इस सिलसिले में आपको छूट देते हैं।’’
उच्च न्यायालय ने 25 जनवरी को बैंस को जमानत देते हुए उन पर कुछ शर्तें भी लगाई थीं।
अपने आदेश में, उच्च न्यायालय ने यह उल्लेख किया था कि बैंस को 11 जुलाई 2022 को हिरासत में लिया गया था और उनके खिलाफ 23 से अधिक मामले दर्ज हैं।
अपनी शिकायत में 44 वर्षीय महिला ने आरोप लगाया था कि बैंस ने एक संपत्ति विवाद में उसकी मदद करने के बहाने और उसकी खराब वित्तीय स्थिति का फायदा उठाते हुए अप्रैल और अक्टूबर 2020 के बीच कई बार उसके साथ बलात्कार किया।
महिला ने इस सिलसिले में बैंस, उनके भाई करमजीत सिंह और परमजीत सिंह पम्मा तथा अन्य के खिलाफ एक शिकायत दर्ज कराई थी।
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