नयी दिल्ली, 14 जून उच्चतम न्यायालय ने पदों के सही आधिकारिक विवरण के साथ पंजाब सिविल सेवा नियम, 1934 को अद्यतन या संशोधित करने में विफल रहने पर बुधवार को नाराजगी जताई।
न्यायमूर्ति विक्रमनाथ और न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की अवकाशकालीन पीठ ने कहा कि नियम समय के साथ तालमेल नहीं बिठा पाए हैं और समय बीतने के कारण असंगति आ गई है।
मूल रूप से 1934 में बनाए गए नियमों में अधिकारियों को 'महानिरीक्षक, एक उपमहानिरीक्षक और एक पुलिस अधीक्षक' के रूप में माना गया था।
अदालत ने कहा कि उस समय महानिरीक्षक (जब सेवा को इंपीरियल/भारतीय पुलिस कहा जाता था) राज्य पुलिस का नेतृत्व करते थे, लेकिन आज राज्य पुलिस के पदानुक्रम में, कुछ को छोड़कर, अधिकतर राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में पुलिस महानिदेशक का पद राज्य पुलिस का शीर्ष पद होता है।
पीठ ने कहा, "वास्तव में, आज पुलिस महानिरीक्षक प्रशासनिक रूप से पुलिस महानिदेशक और अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक के अधीन होते हैं। नियम भी ऐसे समय में बनाए गए थे जब रेंज और आयुक्तालयों की व्यवस्था स्थापित नहीं की गई थी। निश्चित रूप से, नियम समय के साथ तालमेल नहीं बिठा पाए हैं। हम नहीं जानते कि भ्रम को दूर करने के लिए संबंधित अधिकारी पदों के कम से कम सही आधिकारिक विवरण के साथ नियमों को अद्यतन/संशोधित करने में असमर्थ क्यों हैं।
शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के एक आदेश के खिलाफ एक व्यक्ति द्वारा दायर अपील को खारिज करते समय की।
उच्च न्यायालय ने हरियाणा के पुलिस महानिदेशक के आदेश को बहाल रखा था जिसमें भ्रष्टाचार, अवज्ञा और कर्तव्य के प्रति लापरवाही के कारण संबंधित व्यक्ति के संबंध में वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट फिर से तैयार करने का निर्देश दिया गया था।
शीर्ष अदालत ने कहा कि पुलिस महानिदेशक ने अपीलकर्ता को उचित कारण बताओ नोटिस दिया और उसके उपरांत, बाद की कार्रवाई की।
इसने कहा, "घटनाओं की कड़ी को ध्यान में रखते हुए, परिणामी कार्रवाई, हमारे विचार में, मनमानी या न्यायालय की अंतरात्मा को झकझोर देने वाली नहीं कही जा सकती, जिसमें कि हस्तक्षेप की आवश्यकता हो।’’
पीठ ने कहा, "पुलिस जैसी वर्दीधारी सेवा में किसी व्यक्ति के लिए उसकी सत्यनिष्ठा और आचरण से संबंधित प्रतिकूल प्रविष्टि को उस वरिष्ठ अधिकारी द्वारा आंका जाता है जो इस तरह की प्रविष्टि को रिकॉर्ड और अनुमोदित करता है। इस तरह की प्रविष्टि वाले कर्मी को पंजाब सिविल सेवा नियम, 1934 के वैधानिक प्रावधानों के तहत अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त किया जाता है, तत्काल तथ्यों में, कोई ऐसी कार्रवाई नहीं है जिसे यह अदालत रोकना चाहेगी।"
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