नयी दिल्ली, एक दिसंबर उच्चतम न्यायालय मानव अंग और ऊत्तक प्रतिरोपण नियम, 2014 के प्रावधानों की वैधता को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई के लिए शुक्रवार को सहमत हो गया।
इन प्रावधानों के तहत, ‘कैडेवर’ दानकर्ता का अंग या ऊत्तक निकालने से पहले शव का कानूनी अधिकार रखने वाले व्यक्ति या करीबी रिश्तेदार की सहमति की जरूरत होती है।
यह याचिका न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आई। पीठ ने नोटिस जारी किया तथा केंद्र और राष्ट्रीय अंग एवं ऊत्तक प्रतिरोपण संगठन से जवाब मांगा।
याचिका एक नाबालिग ने दायर की है, और न्यायालय ने 20 अक्टूबर को अधिवक्ता गौरव अग्रवाल से इस मामले में सहायता करने को कहा था।
शुक्रवार को सुनवाई के दौरान, पीठ ने पूछा कि यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सीधे शीर्ष न्यायालय में क्यों दायर की गई।
अनुच्छेद 32 अधिकारों को लागू करने के उपायों से संबंधित है।
न्यायमूर्ति कौल ने कहा, ‘‘हम (अनुच्छेद) 32 के तहत सब कुछ चाहते हैं। मैं आपको बताना चाहूंगा कि इसका नकरात्मक पहलू यह है कि सीधे हमें सुनवाई करनी पड़ती है। यदि उच्च न्यायालय अपने विवेक का इस्तेमाल करे तो उच्चतम न्यायालय को उसके फैसले का लाभ मिल सकता है।’’
पीठ ने कहा कि याचिका में उठाये गए मुद्दे का निस्तारण किसी उच्च न्यायालय में क्यों नहीं किया गया।
बाद में, शीर्ष न्यायालय ने विषय की सुनवाई करने का फैसला किया और याचिकाकर्ता को नोटिस जारी किया।
अपनी दलील में, याचिकाकर्ता ने कहा कि मानव अंग और ऊतक प्रतिरोपण अधिनियम, 1994 (टीएचओटीए) की धारा 3(1) अंग दान कर्ता को उसके निधन के बाद उसके अंग/ऊतक को निकालने के लिए अधिकृत करने की अनुमति देता है।
यह आवश्यक अनुमति दो या दो से अधिक गवाहों (जिनमें से कम से कम एक दान कर्ता का करीबी रिश्तेदार हो) की उपस्थिति में नियमों के तहत फॉर्म 7 में बताए गए तरीके से दी जाती है।
अंग प्राप्त करने के लिए ऑनलाइन अनुरोध करने के दौरान ‘आधार’ सत्यापन का भी प्रावधान जोड़ा गया है।
रिट याचिका के जरिये मानव अंग और ऊतक प्रतिरोपण नियम, 2014 के नियम 5(4)(ए) और नियम 5(4)(बी) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।
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