नयी दिल्ली, 11 जून दिल्ली में कोविड-19 के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और इस बीच अस्पतालों में भर्ती होने और जांच कराने तक के लिए मरीजों की लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं, जिसके चलते राजधानी के निवासी अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं।
सरकार जहां एक तरफ आसानी से उपचार मिलने और अस्पतालों में बिस्तरों की पर्याप्त संख्या होने का दावा कर रही है वहीं आंखों देखा हाल बता रहे मरीज कुछ और ही हालात बयान कर रहे हैं।
महानगर के निवासियों का कहना है कि संक्रमण होने के खतरे और कोविड-19 की जटिल जांच प्रक्रिया से गुजरने के डर में कोई अंतर नहीं रह गया है।
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बुधवार को कहा था कि शहर में डेढ़ लाख बिस्तरों की जरूरत पड़ेगी।
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इससे एक दिन पहले उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा था कि जुलाई के अंत तक कोरोना वायरस मामलों की संख्या बढ़कर साढ़े पांच लाख हो जाएगी जो कि बृहस्पतिवार तक सामने आए 32,810 मामलों से कई गुना ज्यादा है।
हालांकि, सरकार अस्पतालों में जरूरत से अधिक बिस्तर होने का दावा कर रही है लेकिन मीडिया और सोशल मीडिया माध्यमों से सामने आती कोविड-19 की कहानियों में राष्ट्रीय राजधानी के उन निवासियों का दर्द और आक्रोश दिखाई दे रहा है जिन्हें अपने बीमार परिजनों के इलाज के लिए परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
सामाजिक कार्यकर्ता अमरप्रीत कौर ने ट्विटर के जरिये अपने बीमार पिता के लिए सहायता मांगी थी लेकिन समय पर इलाज न मिलने से उनकी मौत होने के बाद अमरप्रीत ने ट्वीट किया, “वह नहीं रहे। सरकार विफल हुई।”
कौर के पिता की जांच में एक जून को कोविड-19 की पुष्टि हुई थी लेकिन उन्हें घर पर पृथक-वास में रहने को कहा गया था।
तबीयत बिगड़ने पर कौर के पिता को एलएनजेपी अस्पताल ले जाया गया लेकिन परिजनों के मुताबिक मरीज को भर्ती नहीं किया गया और गंगा राम अस्पताल ले जाने को कहा गया।
कौर ने ट्वीट किया, “मेरे पिता को तेज बुखार है। हमें उन्हें अस्पताल ले जाना होगा। मैं एलएनजेपी दिल्ली के बाहर खड़ी हूं और वे उन्हें भीतर नहीं जाने दे रहे हैं। उन्हें कोरोना, तेज बुखार और सांस की बीमारी है। मदद के बिना वे नहीं बचेंगे। कृपया मदद करें।”
एक घंटे बाद अस्पताल के बाहर कौर के पिता की मौत हो गई।
एलएनजेपी अस्पताल ने लापरवाही के आरोपों का खंडन किया।
कौर की कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई।
कौर अपने परिवार की भी कोरोना वायरस जांच कराना चाहती थीं जिसके लिए उन्होंने फिर ट्विटर का सहारा लिया।
अमन पाठक इस मामले में सौभाग्यशाली रहे।
उन्हें भी अपने बीमार पिता को भर्ती कराने के लिए अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़े और अंततः उन्हें एलएनजेपी अस्पताल में सफलता मिली।
पाठक के पिता अभी अस्पताल के गहन चिकित्सा कक्ष में हैं।
पाठक ने बताया कि उनके 51 वर्षीय पिता को 24 मई को तेज बुखार आया जो कुछ दिनों के बाद उतर गया।
पाठक ने ‘पीटीआई-’ से कहा, “हालांकि, मेरे पिता की भूख समाप्त हो गई थी। हल्के लक्षणों को देखते हुए हमने सोचा कि घर पर ही उनका ध्यान रखा जाएगा। लेकिन तीन जून से उन्हें सांस की तकलीफ भी शुरू हो गई। मैं उन्हें निजी और सरकारी समेत कई अस्पतालों में लेकर गया लेकिन ज्यादातर अस्पतालों ने भर्ती नहीं किया।”
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