नयी दिल्ली, 22 अप्रैल उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक निर्णयों की स्थिरता, निश्चितता, पूर्वानुमान करना और निष्कर्ष तक पहुंचना सुदृढ़ न्याय व्यवस्था की पहचान हैं।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ मद्रास उच्च न्यायालय के सितंबर 2020 के आदेश के खिलाफ अपील पर सुनवाई कर रही है। अपील में, दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 428 के तहत एक विचाराधीन कैदी के रूप में दोषी की रिमांड की एक निश्चित अवधि निर्धारित कर उसकी रिहाई का मार्ग प्रशस्त किया गया था।
शीर्ष अदालत ने सीआरपीसी की धारा 428 की उपयुक्त व्याख्या के लिए उचित संख्या वाली पीठ गठित करने की वांछनीयता पर विचार करने के वास्ते मामले को भारत के प्रधान न्यायाधीश के पास भेज दिया।
दोषी व्यक्ति तमिल लिबरेशन आर्मी से जुड़ा हुआ था।
पीठ ने कहा कि उसके समक्ष प्रस्तुत अपील में सीआरपीसी की धारा 428 की उपयुक्त व्याख्या पर गंभीर प्रश्न शामिल है, बावजूद इसके कि इस तरह के प्रावधान पर कम से कम आधा दर्जन निर्णय सुनाये जा चुके हैं।
न्यायालय ने कहा, ‘‘न्यायिक निर्णयों की स्थिरता, निश्चितता, पूर्वानुमान करना और निष्कर्ष तक पहुंचना एक सुदृढ़ न्याय व्यवस्था की पहचान हैं।’’
पीठ ने कहा कि यदि दोषी को रिहा कर दिया गया तो उसे मामले में फिर से हिरासत में नहीं लिया जा सकता।
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