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गुजरात हाई कोर्ट का अहम फैसला: पति द्वारा पत्नी को बिना बताए रात भर मायके में रुकने पर थप्पड़ मारना क्रूरता नहीं, 23 साल बाद आत्महत्या के मामले में शख्स बरी

गुजरात हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि पति द्वारा पत्नी को थप्पड़ मारना 'क्रूरता' (Cruelty) की श्रेणी में नहीं आता. कोर्ट ने 23 साल पुराने आत्महत्या के मामले में पति को सभी आरोपों से बरी करते हुए इसे सामान्य वैवाहिक मनमुटाव करार दिया.

गुजरात हाई कोर्ट का अहम फैसला: पति द्वारा पत्नी को बिना बताए रात भर मायके में रुकने पर थप्पड़ मारना क्रूरता नहीं, 23 साल बाद आत्महत्या के मामले में शख्स बरी
प्रतीकात्मक तस्वीर (File photo)

अहमदाबाद: गुजरात हाई कोर्ट (Gujarat High Court) ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल कायम करते हुए स्पष्ट किया है कि पति द्वारा अपनी पत्नी को थप्पड़ मारने की एक अकेली घटना को भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) यानी आईपीसी (IPC) की धारा 498A के तहत 'क्रूरता' (Cruelty) नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने 1996 के एक आत्महत्या (Suicide) मामले में पति (Husband) को दोषी ठहराने के 23 साल पुराने फैसले को पलटते हुए उसे सम्मानपूर्वक बरी कर दिया है. यह भी पढ़ें: Court Cases in India: भारतीय अदालतों में लंबित मामलों का अंबार, 4.76 करोड़ से अधिक केस पेंडिंग; सुप्रीम कोर्ट में आंकड़ा 92 हजार के पार

23 साल बाद मिली कानूनी राहत

यह फैसला जस्टिस गीता गोपी की पीठ ने दिलीपभाई मंगलाभाई वरली द्वारा दायर एक आपराधिक अपील पर सुनाया। साल 2003 में एक निचली अदालत ने वरली को अपनी पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने (धारा 306) के लिए सात साल और क्रूरता (धारा 498A) के लिए एक साल की सजा सुनाई थी. वरली की पत्नी ने शादी के एक साल के भीतर मई 1996 में आत्महत्या कर ली थी.

थप्पड़ मारना 'क्रूरता' क्यों नहीं?

हाई कोर्ट ने सबूतों और गवाहों के बयानों का सूक्ष्म विश्लेषण करने के बाद पाया कि पति-पत्नी के बीच झगड़े का कारण पति का देर रात घर आना था. आरोपी पेशे से एक 'बैंजो' वादक था और अतिरिक्त कमाई के लिए कार्यक्रमों में जाता था, जो उसकी पत्नी को पसंद नहीं था.

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:

'बिना बताए मायके में रात बिताने पर पति द्वारा पत्नी को थप्पड़ मारना क्रूरता की श्रेणी में नहीं गिना जा सकता. सामान्य वैवाहिक मनमुटाव या छिटपुट झगड़ों को तब तक आत्महत्या का कारण नहीं माना जा सकता, जब तक कि लगातार उत्पीड़न के पुख्ता सबूत न हों.'

कोर्ट द्वारा गौर किए गए मुख्य बिंदु:

अदालत ने निचली अदालत के फैसले को 'त्रुटिपूर्ण' बताते हुए निम्नलिखित टिप्पणियां कीं:

  • मेडिकल रिपोर्ट का अभाव: पत्नी के साथ लगातार मारपीट के दावों की पुष्टि करने वाला कोई भी अस्पताल का रिकॉर्ड या मेडिकल सबूत मौजूद नहीं था.
  • कोई पुरानी शिकायत नहीं: मृतका ने अपने जीवनकाल में कभी भी उत्पीड़न या दहेज की मांग को लेकर पुलिस में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी.
  • सामान्य वैवाहिक तनाव: गवाहों (यहां तक कि मृतका के पिता) ने भी स्वीकार किया कि वैवाहिक संबंध सामान्य थे और झगड़े केवल पति के देर से घर लौटने जैसी छोटी बातों पर होते थे. यह भी पढ़ें: पति ने बनाया पत्नी का प्राइवेट वीडियो, फेसबुक पर किया शेयर; कोर्ट ने कहा- शादी का मतलब...

कानून की स्पष्ट व्याख्या

हाई कोर्ट ने दोहराया कि धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत दोषसिद्धि के लिए आरोपी की ओर से 'स्पष्ट आपराधिक मंशा' (Mens Rea) और उकसावे का सीधा कृत्य साबित होना अनिवार्य है. केवल भावनात्मक या नैतिक आधार पर किसी को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता.

यह फैसला उन मामलों में एक नजीर बनेगा जहां सामान्य घरेलू झगड़ों को गंभीर आपराधिक धाराओं के तहत अदालतों में घसीटा जाता है.

(The above story first appeared on LatestLY on Feb 20, 2026 02:31 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).