प्रयागराज, 22 अप्रैल इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि सक्षम अधिकारी के पास यह अधिकार है कि वह जनहित में संतोषजनक कारण दर्ज करने के बाद किसी कर्मचारी की अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश पारित कर सके।
न्यायमूर्ति वी समद्दर और न्यायमूर्ति वाई.के. श्रीवास्तव की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड (यूपीएसईबी) द्वारा दाखिल विशेष अपील को स्वीकार करते हुए यह व्यवस्था दी।
इस विशेष अपील के जरिए बोर्ड ने 17 अप्रैल, 2019 के एकल न्यायाधीश के आदेश को चुनौती दी थी जिसमें 23 दिसंबर, 1994 को याचिकाकर्ता रघुराज सिंह के खिलाफ पारित अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश को रद्द कर दिया गया था।
अदालत ने कहा कि पीड़ित व्यक्ति अपनी अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश को इस आधार पर चुनौती नहीं दे सकता कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश पारित करने से पूर्व उसका पक्ष नहीं सुना गया।
एकल न्यायाधीश ने इस आधार पर रिट याचिका स्वीकार कर ली थी कि रिकॉर्ड में ऐसी कोई चीज दर्ज नहीं है जिससे इस विचार को समर्थन मिल सके कि याचिकाकर्ता की सेवा जारी रखना जनहित में नहीं है।
यूपीएसईबी ने इस खंडपीठ के समक्ष दलील दी कि 23 दिसंबर, 1994 को जारी अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश ‘स्क्रीनिंग कमेटी’ की सिफारिश पर और यूपीएसईबी के 22 फरवरी, 1991 के आदेश पर पारित किया गया था।
इस याचिका में एक जवाबी हलफनामा दाखिल किया गया जिसमें बोर्ड द्वारा यह तथ्य पेश किया गया कि उक्त अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश प्रतिकूल रिपोर्ट, कर्तव्यों के निर्वहन में भारी लापरवाही और अनुशासनहीनता के आधार पर पारित किया गया था।
पीठ ने कहा कि यूपी राज्य विद्युत बोर्ड (कर्मचारी सेवानिवृत्ति) विनियमन, 1975 के नियमन 2 (बी) के तहत सक्षम अधिकारी को अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश पारित करने का अधिकार है। एकल न्यायाधीश बोर्ड के रुख पर विचार करने में विफल रहे।
– राजेंद्र
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