देश की खबरें | वित्तीय सहायता में कमी के कारण जलवायु लक्ष्य पुनर्निर्धारित किये जा सकते हैं: भारत

नयी दिल्ली, 31 जनवरी भारत ने शुक्रवार को कहा कि ‘ग्लोबल साउथ’ में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिए विकसित देशों से वित्तीय सहायता की कमी विकासशील देशों को अपने जलवायु लक्ष्यों पर ‘पुनर्निर्धारित’ करने के लिए प्रेरित कर सकती है।

शुक्रवार को संसद में पेश आर्थिक समीक्षा 2024-25 में, सरकार ने कहा कि विकासशील देशों में जलवायु कार्रवाई का समर्थन करने के लिए अजरबैजान में 2024 के संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन (सीओपी 29) में जिस नए वित्तीय पैकेज पर सहमति बनी थी, उससे ‘बहुत कम आशा’ है।

इस वर्ष देशों को 2031-2035 की अवधि के लिए जलवायु योजनाएं या अपने राष्ट्रीय योगदान के बारे में जानकारी पेश करने की जरूरत के बीच आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है, ‘‘वित्तपोषण में कमी से जलवायु लक्ष्यों को फिर से निर्धारित करना पड़ सकता है।’’

वर्ष 2015 में हुए पेरिस समझौते के अनुसार, देशों को हर पांच साल में अपने जलवायु लक्ष्यों को मजबूत बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंथा नागेश्वरन ने कहा है कि विकसित देशों से समर्थन की कमी के बीच घरेलू संसाधन जलवायु कार्रवाई में अहम होंगे।

उन्होंने कहा कि इसलिए, विकास चुनौतियों का सामना करने के लिए संसाधन प्रभावित हो सकते हैं, जिससे सतत विकास उद्देश्यों की दिशा में प्रगति कम हो सकती है और ‘‘अंतरराष्ट्रीय जलवायु साझेदारी की अखंडता से समझौता हो सकता है।’’

नागेश्वरन ने कहा कि 2035 तक सालाना 300 अरब अमेरिकी डॉलर जुटाने का छोटा सा लक्ष्य 2030 तक 5.1-6.8 हजार अरब डॉलर की अनुमानित आवश्यकता का एक ‘अंश’ मात्र है।

उन्होंने कहा कि यह समृद्ध, विकसित देशों की अनिच्छा को रेखांकित करता है कि वे उत्सर्जन में कमी लाने और विकासशील क्षेत्रों में कमजोर आबादी पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने की जिम्मेदारी के अपने न्यायसंगत हिस्से को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं।

साल 1992 में अपनाए गए जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र रूपरेखा समझौता (यूएनएफसीसीसी) के अनुसार, उच्च आय वाले औद्योगिक राष्ट्रों, जो ऐतिहासिक रूप से जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देने वाली ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार रहे हैं, को विकासशील और कम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं को वित्त, प्रौद्योगिकी तथा क्षमता निर्माण सहायता प्रदान करने की आवश्यकता है ताकि उन्हें दुनिया में तापमान वृद्धि से निपटने में मदद मिल सके।

इन देशों में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और यूरोपीय संघ के सदस्य देश जैसे जर्मनी और फ्रांस शामिल हैं।

वैभव

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