देश की खबरें | क्या आप इसलिए ग्रामीण सेवा से छूट मांग सकते हैं कि आपने निजी मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई की है: न्यायालय

नयी दिल्ली, 22 मई क्या स्नातक कर रहा कोई मेडिकल छात्र सिर्फ इसलिए एक साल की अनिवार्य ग्रामीण सेवा से छूट मांग सकता है क्योंकि उसने निजी मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई की है?

यह सवाल उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों-न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति संजय करोल की अवकाश पीठ की ओर से आया, जो कर्नाटक में एक मानद् विश्वविद्यालय की निजी सीटों से स्नातक कर रहे पांच एमबीबीएस छात्रों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

याचिकाकर्ताओं ने कर्नाटक सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण सेवा आयुक्तालय को यह निर्देश दिए जाने का आग्रह किया है कि उन्हें अनिवार्य ग्रामीण सेवा का शपथपत्र दिए बिना आवश्यक अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) जारी किया जाए।

शीर्ष अदालत ने कर्नाटक सरकार और अन्य को नोटिस जारी कर याचिका पर जवाब मांगा।

इसने कहा, "सिर्फ इसलिए कि आप एक निजी संस्थान में जाते हैं और अध्ययन करते हैं, क्या आपको ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने से छूट दी जानी चाहिए?"

वकील मीनाक्षी कालरा के माध्यम से दायर याचिका में याचिकाकर्ताओं के स्थायी पंजीकरण को स्वीकार करने के लिए कर्नाटक चिकित्सा परिषद को निर्देश दिए जाने का भी आग्रह किया गया है।

पीठ ने कहा, "आप भारत में जगह-जगह आते-जाते हैं और विभिन्न ग्रामीण इलाकों में काम करते हैं। ऐसा करना बहुत सुंदर काम है।"

इसने पूछा कि क्या निजी संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों का राष्ट्र निर्माण में योगदान देने का कोई दायित्व नहीं है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि कर्नाटक सरकार ने मेडिकल पाठ्यक्रम पूरा करने वाले छात्रों के लिए कर्नाटक अनिवार्य सेवा प्रशिक्षण अधिनियम, 2012 लागू किया था और बाद में उनके लिए कर्नाटक अनिवार्य सेवा प्रशिक्षण नियम, 2015 लागू किया था।

इसके तहत सरकारी विश्वविद्यालयों या निजी/डीम्ड विश्वविद्यालयों में सरकारी सीट पर पढ़ाई करने वाले सभी मेडिकल छात्रों के लिए एक साल ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा करना जरूरी है। इसके बाद ही कर्नाटक चिकित्सा परिषद डॉक्टरों का स्थायी पंजीकरण करती है।

आयुक्तालय द्वारा जारी 28 जुलाई, 2023 की अधिसूचना का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया कि इसमें निजी/मानद् विश्वविद्यालयों में निजी सीट पर पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए भी यह व्यवस्था की गई है।

याचिका में कहा गया, "निजी/मानद् विश्वविद्यालयों में निजी सीटों पर दाखिला लेने वाले अभ्यर्थियों की स्थिति भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) के न्यायशास्त्र के अनुसार भिन्न है जो काफी अधिक लागत पर अपना अध्ययन पूरा करते हैं। परिणामस्वरूप, वे अनिवार्य सेवा आवश्यकताओं के अधीन नहीं हैं।’’

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