नयी दिल्ली, 15 अक्टूबर दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक मुस्लिम पति द्वारा पत्नी को तलाक देने के मामले में दंडित करने के प्रावधान को असंवैधानिक घोषित करने के अनुरोध वाली याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।
याचिका में कहा गया है कि ‘तीन तलाक’ को पहले ही अमान्य कर दिया गया है, ऐसे में इस तरह के कृत्य के लिए सजा देने संबंधी कानून का प्रावधान दुखद और असंगत है।
हालांकि न्यायमूर्ति विपिन सांघी और न्यायमूर्ति रजनीश भटनागर की पीठ ने मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों के संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 4 के तहत दिल्ली में दर्ज सभी प्राथमिकियों में जांच या सुनवाई पर मौजूदा याचिका के लंबित रहने तक रोक लगाने से इनकार कर दिया।
पीठ ने कहा कि प्रथमदृष्टया ऐसा लगता है कि धारा 4 का उद्देश्य सालों पुरानी परंपरा को हतोत्साहित करना है। जिसके अनुसार अपनी पत्नी को तीन तलाक कहकर रिश्ता तोड़ने वाले पति को तीन साल तक की कैद की सजा और जुर्मान की सजा सुनाई जाएगी।
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पीठ ने कहा, ‘‘जब तक कानून को किसी सक्षम अदालत द्वारा अवैध या असंवैधानिक घोषित नहीं किया जाता या निष्प्रभावी नहीं किया जाता, तब तक कानून को वैध माना जाता है। प्रथमदृष्टया हमें ऐसा लगता है कि उक्त अधिनियम की धारा 4 किसी मुस्लिम पति द्वारा उसकी पत्नी को तीन तलाक कहकर रिश्ता तोड़ने की सदियों पुराने और परंपरागत चलन को हतोत्साहित करना है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘धारा 4 का उद्देश्य इस तरह के चलन की रोकथाम का लगता है। तीन तलाक को अवैध और अमान्य घोषित कर दिया गया है, महज इसलिए यह आशय नहीं निकलता कि विधायिका इस तरह के चलन को जारी रखने को अपराध नहीं बना सकती। यह हमारी प्रथमदृष्टया राय है। इसलिए हम याचिकाकर्ता को कोई अंतरिम राहत देने के पक्ष में नहीं हैं।’’
अदालत एक वकील की याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिन्होंने कानून के तहत उक्त विशेष प्रावधान को प्रारंभ से अमान्य, अधिकार से परे, असंवैधानिक, भेदभावपूर्ण और उनके जैसे मुस्लिम पुरुषों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन घोषित करने की मांग की थी।
याचिकाकर्ता की पत्नी ने उक्त प्रावधान के तहत उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है।
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