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बिहार: आखिर मां के दूध में कैसे पहुंचा यूरेनियम?

बिहार में पहले ही भूजल में आयरन, फ्लोराइड और आर्सेनिक की मानक से अधिक मात्रा लोगों के लिए एक परेशानी बनी हुई थी, अब स्तनपान करा रही महिलाओं के दूध में यूरेनियम की मौजूदगी ने प्रदूषण पर बहस को और तेज कर दिया है.

बिहार: आखिर मां के दूध में कैसे पहुंचा यूरेनियम?
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

बिहार में पहले ही भूजल में आयरन, फ्लोराइड और आर्सेनिक की मानक से अधिक मात्रा लोगों के लिए एक परेशानी बनी हुई थी, अब स्तनपान करा रही महिलाओं के दूध में यूरेनियम की मौजूदगी ने प्रदूषण पर बहस को और तेज कर दिया है.बिहार में स्तनपान कराने वाली महिलाओं के दूध में यूरेनियम पाया गया है. जिन माताओं के दूध में यूरेनियम मिला है, उनके बच्चों के खून में भी यूरेनियम मौजूद था. स्तनपान कराने वाली महिलाओं के दूध में यूरेनियम की मौजूदगी ने मानव स्वास्थ्य पर प्रदूषण के घातक प्रभावों को लेकर बहस तेज कर दी है. जिस शोध में यह जानकारी सामने आई है, उसे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), दिल्ली ने पटना के महावीर कैंसर संस्थान और वैशाली के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्यूटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (नाइपर) सहित पांच अन्य संस्थानों के साथ मिलकर किया था.

जर्मनी में हर सातवें बच्चे पर गरीबी का खतरा

इस शोध से जुड़ी रिपोर्ट प्रतिष्ठित साइंस जर्नल नेचर में प्रकाशित हुई है. राहत की बात है कि जांचे गए ब्रेस्ट मिल्क के सैंपल में यूरेनियम (यू-238) की मात्रा 5.5 माइक्रोग्राम प्रति लीटर से कम रही, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की ओर से पेयजल के लिए निर्धारित सुरक्षा के मानक से कम है. मानक के मुताबिक यूरेनियम की अधिकतम मात्रा 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर हो सकती है. महावीर कैंसर संस्थान के रिसर्च डिपार्टमेंट के विभागाध्यक्ष अशोक कुमार घोष के अनुसार दुनिया में पहली बार मां के दूध में यूरेनियम को लेकर रिसर्च किया गया है. उनके मुताबिक, ‘‘ग्राउंड वाटर में यूरेनियम का प्रदूषण बड़ी चिंता का विषय है. जिससे बिहार सहित 18 राज्यों के 151 जिले प्रभावित हैं.'' यह एक प्राकृतिक रेडियोधर्मी तत्व है. इसकी रेडियोधर्मी व रासायनिक प्रकृति दोनों ही स्वास्थ्य के लिए घातक होती है.

17 से 35 साल की माताओं पर रिसर्च

साल 2021 से साल 2024 के बीच भोजपुर, कटिहार, नालंदा, खगड़िया, समस्तीपुर और बेगूसराय में स्तनपान कराने वाली 17 से 35 साल की 40 महिलाओं पर यह अध्ययन किया गया था. हर सैंपल में यूरेनियम की मात्रा पाई गई. अर्थात सौ फीसदी सैंपल प्रदूषित थे, हालांकि अलग-अलग सैंपल में यूरेनियम की मात्रा अलग-अलग थी. कटिहार जिले की माताओं के सैंपल में यूरेनियम की सर्वाधिक मात्रा 5.25 माइक्रोग्राम प्रति लीटर दर्ज की गई, जबकि औसत स्तर 4.035 माइक्रोग्राम प्रति लीटर पाया गया. भोजपुर की माताओं में यह सबसे कम पाया गया.

हालांकि, यह अहम है कि अभी तक मां के दूध में यूरेनियम की मात्रा के बेंचमार्क यानी मानक तय नहीं हैं. महावीर कैंसर संस्थान की चिकित्सा निदेशक डॉ. मनीषा कहती हैं, ‘‘इससे माताओं के लिए दूध पिलाने में कोई परेशानी नहीं है. मां का दूध अमृत समान है, इससे नवजात को विभिन्न बीमारियों से लड़ने की शक्ति मिलती है. अगर ब्रेस्ट फीडिंग नहीं हुई तो कई तरह स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं उत्पन्न होने का खतरा बढ़ जाता है. वे पहले की तरह शिशुओं को दूध पिलाती रहें.'' यह अभी तय नहीं है मिली हुई यूरेनियम की मात्रा बच्चों के लिए कितनी घातक है.

नवजात बच्चों के खून में भी मिला यूरेनियम

जिन 40 माताओं के ब्रेस्ट मिल्क पर शोध किया गया, उनके 35 नवजात बच्चों के ब्लड सैंपल की भी जांच की गई. 87.5 प्रतिशत शिशुओं के खून में भी यूरेनियम की मात्रा मिली. इनके खून में यूरेनियम का औसत प्रति लीटर चार माइक्रोग्राम रहा. सुकून की बात ये है कि इन बच्चों में शारीरिक या मानसिक, किसी तरह का कोई ऐसा क्लीनिकल सिम्टम नहीं मिला है, जिसके लिए इन्हें उपचार की आवश्यकता हो. शोधकर्ताओं ने यूरेनियम की मौजूदगी का कारण तलाशने के उद्देश्य से सभी 40 महिलाओं के घरों से पानी का सैंपल लेकर जांच के लिए भेजा है. इसकी रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है.

डॉ. अशोक कुमार घोष के अनुसार नवजात के यूरेनियम युक्त दूध का सेवन करने से दो तरह की समस्याएं आ सकती हैं, नॉन कार्सिनोजेनिक पदार्थों से किडनी व न्यूरो संबंधी बीमारियां हो सकती हैं, शारीरिक विकास व आईक्यू प्रभावित हो सकता है, वहीं कार्सिनोजेनिक पदार्थों से कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है. शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. राहुल कुमार कहते हैं, ‘‘इससे सबसे अधिक खतरा उन बच्चों को है, जिनके अंग अभी विकसित हो रहे. उनका शरीर भारी धातुओं को जल्दी अवशोषित करता है और कम वजन होने के कारण जरा सी मात्रा भी कई गुना ज्यादा हानिकारक हो जाती है.'' हालांकि, इस अध्ययन के अनुसार 70 प्रतिशत बच्चों में यूरेनियम के कारण नॉन कार्सिनोजेनिक हेल्थ इफेक्ट की संभावना देखी गई है.

परेशानी का सबब बनता ग्राउंड वाटर

बिहार में पहले ही आयरन, फ्लोराइड व आर्सेनिक की मानक से अधिक मात्रा लोगों के लिए एक परेशानी बनी हुई है. खासकर बक्सर से लेकर भागलपुर तक गंगा नदी के किनारे बसे शहरों और कई अन्य इलाकों के भूजल में पहले से ही इनकी मौजूदगी है. दो वर्ष पहले राज्य के 11 जिलों में पानी में यूरेनियम की मात्रा 50 माइक्रोग्राम प्रति लीटर से अधिक मिली थी. इन इलाकों की महिलाओं से ही सीधे ब्रेस्ट मिल्क के नमूने लिए गए और उसकी जांच की गई. एक अन्य शोध से भी पता चला है कि बिहार में केवल पेयजल में ही आर्सेनिक मौजूद नहीं है, बल्कि फूड चेन खासकर चावल, गेहूं और आलू में भी यह मौजूद है. बल्कि कच्चे चावल की तुलना में पके हुए चावल में आर्सेनिक की अधिक मात्रा पाई गई.

संभावना व्यक्त की जा रही कि आर्सेनिक की तरह ही यूरेनियम भी खाने या फिर ग्राउंड वाटर के जरिए मां के शरीर तक पहुंचा हो. ऐसा कृषि उपजों में यूरेनियम युक्त पानी के इस्तेमाल के चलते हो सकता है. डॉ. अशोक कुमार घोष कहते हैं, ‘‘इस मामले में क्लीनिकल स्टडी की तो जरूरत है ही, फूड चेन या फिर ग्राउंड वाटर में यूरेनियम की मौजूदगी को देखते हुए सरकार को बड़े स्तर पर इस मुद्दे पर काम करना चाहिए.'' यानी भूजल में यूरेनियम के पहुंचने को लेकर भी शोध किया जाना चाहिए.

(The above story first appeared on LatestLY on Nov 26, 2025 05:50 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).