देश की खबरें | एल्डरमैन पर न्यायालय के फैसले के बाद ‘आप’ को आत्मनिरीक्षण करने की जरूरत : उपराज्यपाल कार्यालय

नयी दिल्ली, सात अगस्त दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना के कार्यालय ने बुधवार को कहा कि दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) में ‘एल्डरमैन’ की नियुक्ति पर उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद, आम आदमी पार्टी (आप) को ‘‘आत्मनिरीक्षण’’ करने की जरूरत है।

उपराज्यपाल कार्यालय द्वारा जारी एक बयान में यह उम्मीद भी जताई गई है कि नगर निगम स्थायी समिति के गठन की प्रक्रिया में तेजी लाएगा।

बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए ‘आप’ ने आरोप लगाया कि उपराज्यपाल कार्यालय ‘‘भाजपा के साथ मिलीभगत करके’’ संवैधानिक नियमों का उल्लंघन कर रहा है और उसने कहा कि वह इस फैसले से ‘‘सम्मानपूर्वक असहमति’’ जताता है तथा अन्य कानूनी उपायों पर विचार करेगा।

उच्चतम न्यायालय द्वारा 15 महीने से सुरक्षित रखा गया फैसला सोमवार को सुनाए जाने के बाद, उपराज्यपाल कार्यालय की ओर से यह पहली प्रतिक्रिया है।

प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) डी. वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा तथा न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला की पीठ ने सोमवार को दिल्ली सरकार की उस दलील को खारिज कर दिया जिसमें यह कहा गया था कि उपराज्यपाल को एमसीडी में 10 एल्डरमैन की नियुक्ति के मामले में मंत्रिपरिषद की सलाह और सहायता पर कार्य करने के लिए बाध्य माना जाए।

उपराज्यपाल सचिवालय की ओर से जारी एक बयान में कहा गया, ‘‘उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना ने उम्मीद जताई है कि उच्चतम न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की पीठ द्वारा 'एल्डरमैन' की नियुक्ति के मामले में स्पष्ट रूप से दिए गए फैसले के बाद एमसीडी आवश्यक प्रक्रियाओं को लागू करने के लिए शीघ्रता से कदम उठाएगा, जो पिछले लगभग 19 महीनों से लंबित पड़े हैं।’’

दिल्ली सरकार पर व्यर्थ मुकदमेबाजी में उलझने का आरोप लगाते हुए उपराज्यपाल कार्यालय ने कहा कि सरकार ने न केवल उच्चतम न्यायालय का समय बर्बाद किया, बल्कि जानबूझकर एमसीडी को भी पंगु बना दिया।

बयान में कहा गया, ‘‘यह निर्णय सत्तारूढ़ दल और उसके नेताओं के लिए आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता की ओर इशारा करता है। जनता का हित सर्वोपरि है और इसे राजनीति की भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता।’’

उपराज्यपाल कार्यालय ने कहा कि यदि पिछले वर्ष जनवरी में नियुक्तियों पर उपराज्यपाल के निर्णय के बाद समय रहते वैधानिक समितियों का गठन कर दिया जाता तो स्थायी समिति (एमसीडी में निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था) के गठन न होने के कारण निगम में लंबित कार्य निपटाए जा सकते थे।

बयान में कहा गया, ‘‘उपराज्यपाल ने एल्डरमैन की नियुक्ति के मामले में अपनी फाइल में स्पष्ट रूप से लिखा, दिल्ली नगर निगम अधिनियम (डीएमसी), 1957 की धारा 3(3)(बी)(आई) के तहत संविधान के अनुच्छेद 239एए के साथ पढ़ते हुए… मैं दिल्ली नगर निगम में निम्नलिखित 10 व्यक्तियों की नियुक्ति करता हूं।’’

बाद में जारी एक बयान में आम आदमी पार्टी (आप) ने उपराज्यपाल कार्यालय की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ‘‘उपराज्यपाल के कार्यालय ने ही बार-बार सभी संवैधानिक सीमाओं और नियमों का उल्लंघन किया है, जिसके कारण हमें बार-बार उन्हें अदालत में ले जाने के लिए मजबूर होना पड़ा है।’’

उसने कहा, ‘‘दिल्ली सरकार को अदालतों से लगातार राहत मिली है। अगर हम गलत होते तो डीईआरसी मामले या दिल्ली महापौर के चुनाव पर अदालतें हमारे पक्ष में फैसला क्यों देतीं?‘‘

बयान में कहा गया, ‘‘हमने उनके (केंद्र सरकार) द्वारा ‘सेवाओं’ पर जारी असंवैधानिक नोटिस के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में आठ साल तक लड़ाई लड़ी। हमारे मुकदमे के बिना, दिल्लीवासियों को उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ का आदेश नहीं मिल पाता। उन्होंने इस असंवैधानिक आदेश से आठ साल तक दिल्लीवासियों को परेशान किया। न्यायालय के फैसले के सिर्फ आठ दिन बाद उन्होंने एक संशोधन पेश किया, जिससे दिल्लीवासियों के पास अदालत का दरवाजा खटखटाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।’’

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