(मनीष सैन)
नयी दिल्ली, 18 अप्रैल अलमारियों में बड़ी संख्या में सजी किताबें, मदद के लिए तैयार कर्मचारी और जिज्ञासु बच्चे कहीं हों तो यह जाहिर तौर पर एक पुस्तकालय है। लेकिन ऐसे पुस्तकालय हों तो कैसा हो, जहां ‘शांत रहें’ के बोर्ड या बच्चों को चुप रहने के लिए कहने के बजाय जोर से कहानियां सुनाई जा रही हों और ढेर सारे खेल खेले जा रहे हों।
दक्षिण दिल्ली के खिड़की एक्सटेंशन में ऐसा ही एक पुस्तकालय भारत भर के ऐसे 230 से अधिक पुस्तकालयों में से एक है। ‘कनेक्टेड टू द फ्री लाइब्रेरीज नेटवर्क’ (एफएलएन) ने पुस्तकालयों को ऐसे सामुदायिक स्थानों के रूप में परिकल्पित किया है जहां गतिविधियों, कहानियों, नाटक, खेल, बातचीत और बहुत सारी पढ़ाई के माध्यम से बच्चों के बीच जुड़ाव को प्रोत्साहित किया जाता हो।
उदाहरण के लिए, पिछले दिनों एक दोपहर को, नोएडा की ‘किस्सागढ़ एक्टिव लाइब्रेरी’ में कुछ किशोर सादत हसन मंटो की विभाजन पर आधारित कहानी ‘खोल दो’ नाटक का मंचन कर रहे थे। कुछ किलोमीटर दूर, तुगलकाबाद गांव की ‘किताबी दोस्त लाइब्रेरी’ में कुछ बच्चे एक-दूसरे को कहानियां सुना रहे थे, कुछ आकृतियां बना रहे थे और खेलने के लिए अगला खेल चुन रहे थे।
शहर के दूसरे हिस्से में, खिड़की एक्सटेंशन स्थित ‘कम्युनिटी लाइब्रेरी प्रोजेक्ट’ (टीसीएलपी) के बच्चे भी कुछ अलग तरह का खेल खेल रहे थे।
पुस्तकालयों से पारंपरिक रूपी से जुड़ी माने जाने वाली गंभीरता इन “निःशुल्क, स्वतंत्र और जमीनी स्तर के पुस्तकालयों” में गायब हो जाती है। इन्हें कुछ युवक और युवतियां संचालित कर रहे हैं जो कभी खुद इसके शुरुआती सदस्य थे।
किस्सागढ़ के संस्थापक कपिल पांडे ने ‘पीटीआई-’ को बताया, ‘‘हम इसे सक्रिय पुस्तकालय कहते हैं क्योंकि हम पुस्तकालय में बात न करने के विचार को बदलना चाहते थे और इसे सक्रिय और गतिविधि आधारित रखना चाहते थे।’’
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