देश की खबरें | कोयला आधारित 65 प्रतिशत संयंत्र 2022 तक पर्यावरण मानकों का पालन करने में नहीं हैं सक्षम : सीएसई
एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, 18 सितंबर पर्यावरण पर काम करने वाली अग्रणी शोध संस्था सीएसई ने कहा है कि भारत में कोयला आधारित 65 प्रतिशत बिजली संयंत्र समय सीमा 2022 किए जाने के बावजूद केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा अधिसूचित उत्सर्जन मानकों का पालन करने में सक्षम नहीं हैं।

सेंटर फॉर साइंस एंड इनवॉयरमेंट (सीएसई) ने अपने ताजा मूल्यांकन में कहा है कि देश में बहुत सारे कोयला आधारित ऊर्जा संयंत्र समय सीमा तक मानकों को पूरा करने के लिहाज से काफी पीछे हैं ।

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केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में चार प्रदूषकों-अति सूक्ष्म कण (पीएम), सल्फर डाय ऑक्साइड (एसओ2), नाइट्रोजन ऑक्साइड और पारा के लिए उत्सर्जन नियमों को अधिसूचित किया था ।

सीएसई ने कहा कि नियमों को पूरा करने के लिए 2019 की समय सीमा निर्धारित की गयी थी लेकिन उद्योग के दबाव के बाद इस समय-सीमा को 2022 तक विस्तारित करने का फैसला किया गया।

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सीएसई की औद्योगिक प्रदूषण टीम के वरिष्ठ कार्यक्रम प्रबंधक निवित कुमार यादव ने बताया, ‘‘पर्यावरण नियमों को पूरा करने के लिए 2022 की समय सीमा निर्धारित की गयी है लेकिन सीएसई के नए और अद्यतन आकलन से पता चला है कि देश में बड़ी संख्या में कोयला आधारित बिजली संयंत्र नियमों का पालन करने के लिहाज से काफी पीछे चल रहे हैं। ’’

उन्होंने कहा, ‘‘जिस गति से वे काम कर रहे हैं ऐसे में 65 प्रतिशत संयंत्र विस्तारित समय सीमा तक नियमों का पालन करने में समक्ष नहीं होंगे।’’

नियमों के तहत बिजली संयंत्रों को तीन समूहों में बांटा गया है। इसमें वर्ष 2004 के पहले स्थापित, 2004 और 2016 के बीच तैयार और 2016 के बाद शुरू संयंत्र शामिल है । हर श्रेणी के लिए अलग उत्सर्जन और पानी बहाव के मानक निर्धारित किए गए हैं ।

इस साल मई में सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने कहा था कि कोयला आधारित संयंत्र देश में सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयां हैं ।

नारायण ने कहा था, ‘‘सभी उद्योगों से पीएम के कुल उत्सर्जन में उनका योगदान 60 प्रतिशत से ज्यादा है। एसओ2 के उत्सर्जन में उनका योगदान 45 प्रतिशत है। पारा के उत्सर्जन में 80 प्रतिशत और नाइट्रोजन ऑक्साइड के उत्सर्जन में 30 प्रतिशत योगदान है। इसलिए अगर हम कोयला का इस्तेमाल जारी रखते हैं तो भारत के ताप बिजली संयंत्रों को सुधारना होगा।’’

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