अमेरिका के तेल कंट्रोल से बचने के लिए क्या कर रहा है चीन
चीन को कच्चे तेल की सप्लाई करने वाले अहम देशों पर अमेरिका चाबुक चला चुका है.
चीन को कच्चे तेल की सप्लाई करने वाले अहम देशों पर अमेरिका चाबुक चला चुका है. इस लिस्ट में हाल में वेनेजुएला भी जुड़ गया है. ऐसे में बीजिंग को इन देशों की चिंता करने के अलावा तेल की सप्लाई के नए विकल्प खोजने पड़ रहे हैं.चीन अपनी जरूरत का करीब 20 फीसदी पेट्रोलियम तेल ईरान से खरीदता था और 4-5 प्रतिशत वेनेजुएला से. लेकिन अब ये दोनों देश अमेरिकी पाबंदियों और दबाव में हैं. जनवरी की शुरुआत में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलास मादुरो को बंधक बनाकर सत्ता से हटा दिया. इसके साथ ही दुनिया में सबसे बड़े तेल भंडार वाले देश वेनेजुएला की तेल सप्लाई अमेरिका की तरफ मोड़ दी गई. वहीं ईरान के साथ व्यापार करने वालों पर ट्रंप ने 25 फीसदी टैरिफ लगा दिया.
ईरानी तेल की सप्लाई में बाधा की आशंका और वेनेजुएला के तेल भंडार पर अमेरिकी नियंत्रण से दुनिया भर में तेल के दाम उछल गए. अमेरिका के इन कदमों से दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन की ऊर्जा सुरक्षा संकट में आने लगी है.
क्या चीन घरेलू तेल सप्लाई के भरोसे रह सकता है?
तेल आपूर्ति में आई इस बाधा से निपटने के लिए बीजिंग के पास बहुत सीमित विकल्प हैं. चीन का अपना घरेलू तेल उत्पादन इस कमी को भरने लायक नहीं है. विदेशों से खरीदा जाने वाला ज्यादातर तेल चीन तक मलक्का की खाड़ी से पहुंचता है. इस खाड़ी पर अमेरिकी नौसेना पेट्रोलिंग करती है. ट्रंप के पहले राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान इस खाड़ी को लेकर दोनों देशों में तनाव भी दिखा.
2019 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपने ही घर में पेट्रोलियम की खोज और रिफाइनिंग के लिए जोरदार अभियान शुरू करने का आदेश दिया. उन्होंने सात वर्षीय एक्शन प्लान बनाया. चीन की दिग्गज तेल कंपनियों CNPC, सिनोपेक और CNOOC ने इस दौरान अरबों डॉलर का निवेश किया. लेकिन नतीजे औसत ही रहे. 2018 में चीन का घरेलू तेल उत्पादन 38 लाख बैरल प्रतिदिन था. 2025 में यह 43.2 लाख बैरल प्रतिदिन रहा.
सिंगापुर स्थित सीनियर तेल बाजार समीक्षक, जून गोह कहती हैं कि 2021 के बाद की प्रगति चीन के लिए उत्साहजनक है, लेकिन यह इतनी नहीं कि चीन अपनी मांग पूरी कर सके. साथ ही अब नए ऑयल रिजर्व खोजने में कठिनाइयां आ रही हैं.
चीन के घरेलू तेल उत्पादन पर नजर रखने वाले एक अन्य विशेषज्ञ, ज्यादा साफ शब्दों में बीजिंग की दुविधा का जिक्र करते हैं. लॉरी मिलिविरता, सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर में प्रमुख समीक्षक हैं. डीडब्ल्यू से उन्होंने कहा, "बीते 15 वर्षों में बड़े पैमाने पर निवेश के बावजूद उत्पादन करीब स्थिर ही है." मिलिवरता के मुताबिक, नए तेल कुओं, फ्रैकिंग फील्डों और समुद्री फील्डों में अरबों युआन खर्चने के बावजूद घरेलू तेल उत्पादन किफायती साबित नहीं हुआ.
स्टॉक में रखा तेल कब तक मदद करेगा
घरेलू उत्पादन में औसत नतीजे मिलने के बाद अब चीन, ज्यादा से ज्यादा तेल स्टॉक कर रिजर्वों में रखना चाह रहा है. 2023 के आखिर से चीन के नीति निर्माताओं ने स्ट्रैटजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) को बढ़ाने का अभियान छेड़ा है. यह कदम बढ़ते भूराजनीतिक तनावों और यूक्रेन पर रूस के हमले के मद्देनजर उठाए गए हैं.
शुरुआत में चीन को ईरान और रूस से मिलने वाले सस्ते कच्चे तेल से बड़ी राहत मिली. 2025 तक मॉस्को, चीन का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना रहा. लेकिन रूसी तेल कंपनियों और टैंकरों पर अमेरिकी प्रतिबंध लगते ही, तेल की ये धार टपकती बूंदों में बदल गई. बीजिंग ने इस कमी को ईरान के सहारे भरने की पूरी कोशिश की. 2025 में एक दौर ऐसा भी आया जब ईरान की पूरी तेल सप्लाई, यानी 20 लाख बैरल प्रतिदिन का आउटपुट, अलग अलग रास्तों से चीन तक पहुंच रहा था.
2025 में ही चीन ने ऑयल स्टॉक का भी काफी हद तक विस्तार किया. अक्टूबर 2025 में समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने दावा किया कि चीन ने 11 नई स्टोरेज साइट्स बना ली हैं, जो 2026 की शुरुआत में चालू हो सकती हैं. जून गोह तो लगता है कि तेल का ये स्टॉक, ईरान, वेनेजुएला और रूस से घटती तेल सप्लाई से निपटने में कुछ हद तक मदद करेगा, "चीन के पास फिलहाल 110 तक कवर है, जो कि OECD के 90 दिन के भंडार से बड़ा है." गोह के मुताबिक चीन ने स्ट्रैटजिक पेट्रोलियम रिजर्व और कर्मशियल रिजर्व के जरिए इस क्षमता को 180 दिन तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है.
कई क्षेत्रों में तेल की जगह बिजली का इस्तेमाल
स्टॉक रिजर्व भले ही तनाव की स्थिति में फौरी राहत दें, लेकिन लंबे समय तक इनके भरोसे नहीं रहा जा सकता है. चीन, अक्षय ऊर्जा के जरिए भी इस दुविधा से निपटने की तैयारी कर चुका है. वह दुनिया में अक्षय ऊर्जा का सबसे बड़ा उत्पादक है. बीते पांच साल में चीन ने पेट्रोलियम के सहारे चलने वाले कई सेक्टरों को बिजली की तरफ मोड़ा है. बहुत ज्यादा ऊर्जा गटकने वाले परिवहन और भारी उद्योग भी बिजली के सहारे चलने लगे हैं.
बीते साल फरवरी में चीन की सबसे बड़ी सरकारी तेल कंपनी CNPC ने दावा किया कि ट्रांसपोर्ट सेक्टर में तेल की मांग 2023 में अपने उच्चतम स्तर पर थी. अब इसका बड़ा हिस्सा बिजली से चल रहा है. बीजिंग, तेजी से अपने ग्रिड अपग्रेड कर रहा है और बिजली को कोने कोने तक पहुंचाने के लिए अल्ट्रा हाई वोल्टेज लाइनें बिछा रहा है. चीन में बिकने वाली नई कारों में अब 50 फीसदी इलेक्ट्रिक हैं. कई महानगरों में बसों का पूरा बेड़ा इलेक्ट्रिक किया जा चुका है. देश भर में 10 लाख से ज्यादा ईवी चार्जिंग स्टेशन काम कर रहे हैं.
2024 और 2025 में चीन ने अकेले, पूरी दुनिया से ज्यादा सौर ऊर्जा अपने ग्रिडों में जोड़ी. ऐसा ही रिकॉर्ड पवन ऊर्जा के क्षेत्र में भी बनाया गया. मिलिविरता कहते हैं, "चीन की पवन और सौर ऊर्जा क्षमता की विकास दर बीते तीन साल में हर वर्ष 300 गीगावॉट से ज्यादा रही और बीते साल शायद यह 400 गीगावॉट तक पहुंची."
लेकिन इन सबके बावजूद, कच्चे तेल पर निर्भरता को कम नहीं किया जा सकता. मार्च 2026 में चीन के शीर्ष नेता 2030 के बाद शुरू होने वाले दशक की नीतियों का खाका तैयार करने वाले हैं. अनुमान है कि उस पंचवर्षीय योजना में भी घरेलू तेल उत्पादन, तेल की खोज, अक्षय ऊर्जा के विस्तार पर खूब निवेश किया जाएगा.
(The above story first appeared on LatestLY on Jan 23, 2026 08:50 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

