हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान यूरोप की सरहदों के बाहर भी धुर-दक्षिणपंथी राजनीति के चहेते हैं. क्यों फार-राइट खेमा उन्हें नायक मानता है? क्यों दूसरे देशों के नेता भी चुनाव में ओरबान को जिताने की अपील कर रहे हैं?मध्य यूरोप में, आल्प्स पर्वत शृंखला के पूरब में एक छोटा सा देश है हंगरी. एक करोड़ से भी कम आबादी वाले इस देश में 12 अप्रैल को संसदीय चुनाव है, और यह चुनाव अंतरराष्ट्रीय आकर्षण का विषय बन गया है. इसका श्रेय जाता है, विक्टर ओरबान को.
हंगरी में ओरबान की हार और विपक्ष की जीत काफी नहीं, असल जीत दो-तिहाई बहुमत में
तकरीबन 28 बरस बीते, जब ओरबान ने पहली बार हंगरी के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी. साल 1998 की गर्मियां थीं. हंगरी में संसदीय चुनाव हुआ. 'अलायंस ऑफ यंग डेमोक्रैट्स-हंगैरियन सिविक यूनियन (संक्षेप में फिडेस) पार्टी को जीत मिली और 35 साल के ओरबान समूचे यूरोप के सबसे युवा प्रधानमंत्री बन गए. यह तब की बात है जब हंगरी ना ईयू का सदस्य था, ना उसका नाटो में दाखिला हुआ था.
सत्ता में अब तक कितना लंबा सफर रहा ओरबान का?
तब क्या किसी ने सोचा होगा कि यह एक ऐसी लंबी पारी की शुरुआत है, जो ना केवल हंगरी को राष्ट्रवादी और रूढ़िवादी राजनीति का एक सिरमौर बना देगी, खुद ओरबान भी दक्षिणपंथी राजनीति के पोस्टर बॉय बन जाएंगे? सिर्फ यूरोप में ही नहीं, बल्कि अटलांटिक पार अमेरिका में भी 'अनुदार, घोर राष्ट्रवादी, क्रिश्चियन पहचान पर जोर देती' ट्रंप मार्का राजनीति के 'फाउंटेनहेड' बन जाएंगे?
ओरबान बहुत लंबी राजनीति कर चुके हैं. कितनी लंबी, इसका अंदाजा उनके समकालीनों से साफ होगा. 1998 में जब ओरबान पहली बार पीएम बने, तब फ्रांस में बतौर राष्ट्रपति जाक शिराक का पहला कार्यकाल चल रहा था. गेरहार्ड श्रोएडर जर्मनी के चांसलर थे. ब्रिटेन में टोनी ब्लेयर और अमेरिका में बिल क्लिंटन की सरकार थी. बोरिस येल्तसिन रूस के राष्ट्रपति थे और पुतिन को अब तक प्रधानमंत्री पद भी नहीं मिला था.
साल 2002 के चुनाव में हार के साथ ओरबान की यह पहली पारी खत्म हुई. इसके बाद हंगेरियन सोशलिस्ट पार्टी सत्ता में आई. 2010 में पीएम पद पर ओरबान की वापसी तक, मई 2002 से मई 2010 के आठ साल में देश तीन प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल देख चुका था. अप्रैल 2010 में जिस संसदीय चुनाव के साथ ओरबान फिर लौटे, तब उनकी फिडेस पार्टी वैचारिक तौर पर सेंटर-राइट हुआ करती थी. यह पहला चुनाव था, जब हंगरी की एक धुर-दक्षिणपंथी पार्टी 'यॉबीक' (या, मूवमेंट फॉर अ बेटर हंगरी) 17 फीसदी मत पाकर पहली दफा संसद में दाखिल हुई.
किस तरह की राजनीति करते हैं ओरबान?
ओरबान की इस दूसरी पारी के 16 साल पूरे हो चुके हैं. उनकी इस डेढ़ दशक लंबी राजनीतिक पारी में यॉबीक का जिक्र अहम है, क्योंकि यह ओरबान की राजनीतिक शैली में आए एक बड़े बदलाव का अहम पात्र है. 2010 के आसपास यॉबीक बहुत विवादित पार्टी थी. यहां तक कि इसे 'नव-नाजी' भी कहा जाता था.
'यूरो न्यूज' की एक पुरानी खबर के मुताबिक, साल 2012 में संसद में पार्टी के डिप्टी लीडर मार्तोन जेनजूशी ने सरकार से यहूदी वंशावली के लोगों की गिनती करने की अपील की. उन्होंने कहा कि ऐसे लोग "हंगरी की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा" हैं. यहूदी विरोध के आरोपों के अलावा इस पार्टी पर रोमा समुदाय और एलजीबीटीक्यू के लिए नफरत फैलाने के भी आरोप थे.
ओरबान की दूसरी पारी में फिडेस पार्टी मध्य-दक्षिण रुझान से कहीं आगे बढ़कर धुर-दक्षिणपंथी विचारधारा में ढल चुकी है. इस गंतव्य तक पहुंचने के लिए ओरबान ने जिन विचारों और मुद्दों को अपनाया, वो मूलत: यॉबीक के बताए जाते हैं. फिडेस के फार-राइट की ओर बढ़ने, या यूं कहें यॉबीक की विचारधारा को सोखकर अपना बनाने की प्रक्रिया ओरबान की दूसरी पारी के शुरुआती सालों में ही शुरू हो गई थी. 2012-13 तक यह ट्रांजिशन अच्छी तरह साफ हो गया था.
मसलन, जनवरी 2013 में जर्मन मैगजीन श्पीगल ने अपने एक आर्टिकल में लिखा: हंगरी की यॉबीक पार्टी के दक्षिणपंथी चरमपंथियों की एक गंभीर समस्या है. यॉबीक के प्रमुख नेता दावा करते हैं कि प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान के नेतृत्व में सत्तारूढ़ गठबंधन के सदस्य लगातार उनकी पार्टी के "मुद्दों और विचारों को चुरा रहे हैं" और इन्हें अपना बताकर पेश कर रहे हैं. इसी आर्टिकल में हंगरी के एक राजनीतिक लेखक योर्ज दलोस ने बताया, "अब फिडेस और यॉबीक के सोचने में कोई स्पष्ट अंतर नहीं रहा."
यह बहुत दिलचस्प है. ओरबान के नेतृत्व में फिडेस ना केवल धुर-दक्षिणपंथी पार्टी बन गई, बल्कि यूरोपीय स्तर पर राइट और फार-राइट खेमे के लिए एक वैचारिक-शैलीगत प्रेरणा भी बन गई. वहीं, यॉबीक के लिए फार-राइट की राजनीति करने का स्कोप ही नहीं बचा. फिडेस से असंतुष्ट रूढ़िवादी खेमे में जगह बनाने के लिए यह दल एक अपेक्षाकृत नरम दक्षिणपंथ, सेंटर-राइट की ओर बढ़ता गया. उसे उम्मीद थी कि मध्यममार्ग पकड़ने से वह ओरबान को चुनौती दे सकेगा.
2018 के चुनाव में बड़ी उम्मीद के बावजूद यह जुआ यॉबीक के काम नहीं आया. उसे करीब 19 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन ओरबान लगातार तीसरी बार चुनाव जीत गए. नतीजे से निराश यॉबीक ने आत्ममंथन किया और बहस छिड़ी कि हमें वापस अपनी धुर-दक्षिणपंथी जड़ों की ओर लौटना चाहिए. इसपर आम सहमति नहीं बनी और पार्टी के दो टुकड़े हो गए. पार्टी के तत्कालीन उपाध्यक्ष लासलो तोरोत्स्कई ने एक नया राजनीतिक मंच बनाने की घोषणा की. इसका नाम रखा गया, मी होजांक (अंग्रेजी में, आवर होमलैंड).
हंगरी के पीएम ओरबान ने बनाया नया धुर-दक्षिणपंथी गठबंधन
साल 2020 में ओरबान को मिलकर चुनौती देने के लिए विपक्षी दलों ने एक 'यूनाइटेड फॉर हंगरी अलायंस' बनाया. इसमें यॉबीक भी शामिल था. इस गठबंधन में सेंटर टू लेफ्ट झुकाव की भी पार्टियां थीं. फिर 2022 में जब चुनाव हुआ, तो यॉबीक को और बड़ा झटका मिला. उसने तो अपना मूल धुर-दक्षिणपंथी विचार तज दिया था, लेकिन अब उसके वोटर बेस की उसमें दिलचस्पी नहीं रही थी.
उसके बहुत से वोटर फिडेस की ओर चले गए, तो कई यॉबीक से ही टूटकर बने ज्यादा अतिवादी 'मी होजांक' के साथ हो लिए. इस चुनाव में संसद में प्रवेश की न्यूनतम पांच फीसदी वोट पाने की शर्त पूरी करके छह सीटों के साथ 'मी होजांक' पहली बार पार्लियामेंट में दाखिल हुआ. यॉबीक की हालत अब यह है कि उसका जनाधार नहीं बचा है. 2026 का चुनाव दो दशक में पहला मौका है जब यॉबीक उम्मीदवारों की राष्ट्रीय सूची भी जारी नहीं कर पाया. वह बस चुनिंदा विपक्षी उम्मीदवारों को समर्थन दे रहा है.
हंगरी में कितनी आजाद है मीडिया और चुनावी तंत्र?
डेढ़ दशक से भी लंबी दूसरी पारी में प्रचंड बहुमत के बूते ओरबान ने संवैधानिक संशोधन करके अपने लिए एक ऐसा तंत्र बनाया, जहां राजनीतिक तौर पर विपक्ष के बलिष्ठ होने की बहुत गुंजाइश नहीं थी. स्वतंत्र मीडिया के रास्ते बंद कर दिए गए.
बहुत से बंद हो गए, बहुतों का 'पार्टीकरण' कर दिया गया. रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स के मुताबिक, हंगरी में प्रेस के तकरीबन 80 फीसदी हिस्से को ऐसे कारोबारी नियंत्रित करते हैं जिनके सरकार के साथ संबंध हैं. आलोचकों का कहना है कि सरकारी मीडिया के साथ मिलकर ये कथित स्वतंत्र मीडिया, सत्ता के प्रचार तंत्र की भूमिका निभा रही है.
एक बड़ा बदलाव जो ओरबान के पक्ष में गया, वह था चुनावी व्यवस्था में फेरबदल. वोटर 199 सीटों वाली नेशनल असेंबली के लिए मत डालते हैं. इस मिश्रित व्यवस्था में दो वोट होते हैं. एक, आनुपातिक. दूसरा, प्रत्यक्ष प्रतिनिधि का चुनाव. इनमें से 106 सीटों का चुनाव एक सदस्य वाले चुनाव क्षेत्रों से और 93 का चुनाव पार्टी लिस्ट से होता है. यह व्यवस्था असंगत है और ओरबान द्वारा बार-बार इस तरह डिजाइन की जाती रही है कि उनकी पार्टी को अनुचित लाभ मिलता रहे. इस सिस्टम में चुनाव तो स्वतंत्र है, लेकिन निष्पक्ष कतई नहीं है.
साल 2010 से ही फिडेस पार्टी निर्वाचन क्षेत्रों को अपने पक्ष में आकार देती रही है. 'फ्रीडम हाउस' की रिपोर्ट के मुताबिक, हंगरी की जटिल चुनावी व्यवस्था में सभी उम्मीदवारों/ दलों को मुकाबले में एकसमान बराबर अवसर नहीं मिलता. चुनावी अनियमतिताओं के खिलाफ प्रभावी कानूनी सुनवाई नहीं है. चुनाव प्रशासन स्वतंत्र नहीं है और सत्तारूढ़ गठबंधन के पक्ष में दिखता है. इसके अलावा, हालिया सालों में हुए कई कानूनी बदलाव भी चुनावी नतीजे को प्रभावित करते हैं.
फिर भी चुनावी सर्वेक्षणों में हार रहे हैं ओरबान
इस पक्षपाती तंत्र के बावजूद इस दफा ओरबान मुश्किल में हैं. चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में वह हारते नजर आ रहे हैं. 8 अप्रैल को पोलिंग एजेंसी 'मीडियन' के सर्वेक्षण में विपक्षी नेता पीटर माग्यार के नेतृत्व में तिसा पार्टी को संसद में दो-तिहाई बहुमत मिलने का अनुमान है. इसमें तिसा को 138 से 142 सीटें मिलती दिख रही हैं.
वहीं, फिडेस को 49 से 55 सीटें और धुर-दक्षिणपंथी 'मी होजांक' को पांच-छह सीटें मिलने की संभावना है. रॉयटर्स के मुताबिक, हंगरी में चुनावी नतीजे की भविष्यवाणी में मीडियन का मजबूत रिकॉर्ड है. पिछले चुनाव में उसने ओरबान के जीतने की संभावना बताई थी, जो सही साबित हुई.
कौन हैं जॉर्ज सोरोस, जिन्हें कई लीडर कहते हैं "पपेट मास्टर"
हालांकि, गड़बड़ी की भी आशंका है. 2010 में लाए एक कानून के कारण रोमानिया और सर्बिया जैसे पड़ोसी देशों में रहने वाले हंगरी के लोग डाक के माध्यम से वोट कर सकते हैं. रॉयटर्स ने लोकतंत्र समर्थक समूहों के हवाले से चेताया है कि इन देशों में ओरबान समर्थक पार्टियां वोट जमा करती हैं, जिसके कारण हेरफेर की आशंका बढ़ जाती है.
एथनिक माइनॉरिटीज के मामले में प्रेफ्रेंशल मैनडेट के तहत संसदीय सीट के लिए अपेक्षाकृत कम वोट चाहिए. यह भी ओरबान के गठबंधन को फायदा पहुंचा सकता है. क्योंकि, रोमा और जर्मन अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिनिधि आमतौर पर सत्तारूढ़ फिडेस-केएनडीपी गठबंधन का समर्थन करते दिखते हैं.
धुर-दक्षिणपंथी धड़े में ओरबान की अपील
यूरोप में धुर-दक्षिणपंथी पार्टियों का जनाधार भले बढ़ रहा हो, लेकिन महाद्वीप के इतिहास के कारण राजनीतिक मुख्यधारा में उनकी स्वीकार्यता सीमित है. गठबंधन सरकार की सूरत में पारंपरिक दल उनसे हाथ मिलाने से कतराते हैं. फार-राइट को सत्ता में पहुंचने से रोकने के लिए विरोधी विचार की पार्टियां भी अस्थायी मेल कर लेती हैं, जैसा फ्रांस और जर्मनी में दिखा.
वहीं, दूसरी तरफ हंगरी है जहां ओरबान इतने लंबे समय तक सत्ता को अपने पास रखने में सफल हुए. बेशक इसमें व्यवस्थायी तिकड़मों और तंत्र के प्रबंधन का भी हाथ है. यूरोप का धुर-दक्षिणपंथी खेमा किसी नायक की तरह उनकी कामयाबी में गर्व लेता और सराहता है. 'सेंट्रल यूरोपियन यूनिवर्सिटी' के डेमोक्रैसी इंस्टिट्यूट के मुताबिक, हंगरी यूरोप का सबसे ज्यादा राइट विंग देश है.
चुनावी सर्वेक्षणों में पिछड़ते ओरबान के लिए यूरोप में जगह-जगह से अपील आ रही है. जनवरी 2026 में ओरबान ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो डाला, जिसमें बहुत से नेताओं ने उनके लिए अपील की थी. ओरबान ने पोस्ट में बेन्यामिन नेतन्याहू समेत 12 लीडरों को टैग करके लिखा, "समर्थन के लिए शुक्रिया." वीडियो में जर्मनी की धुर-दक्षिणपंथी पार्टी एएफडी की नेता एलिस वाइडेल कहती नजर आईं, "यूरोप को विक्टर ओरबान की जरूरत है."
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने कहा, "हम साथ मिलकर एक ऐसे यूरोप के पक्ष में हैं जो राष्ट्रीय संप्रभुता का सम्मान करता है और अपनी सांस्कृतिक व धार्मिक जड़ों पर गर्व करता है." इस्राएल के पीएम नेतन्याहू बोलते नजर आए, "सुरक्षा को हल्के में नहीं लिया जा सकता है, इसे जीतना होगा." नेतन्याहू ने ओरबान को साहसी बताते हुए कहा कि उनमें अपने देश की रक्षा के लिए जरूरी सभी गुण हैं.
मार्च 2026 में ओरबान ने बाकायदा बुडापेस्ट में एक कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया, जहां केवल यूरोप नहीं बल्कि दक्षिण अमेरिका और अमेरिका के लीडरों का जमावड़ा लगा. उन्होंने हंगरी चुनाव में ओरबान के लिए समर्थन जताया.
ओरबान को जिताने में जुटे ट्रंप, हंगरी चुनाव में अमेरिका की इतनी दिलचस्पी क्यों?
फ्रांस की धुर-दक्षिणपंथी नेता मरीन ला पेन ने ओरबान को "एक असाधारण नेता" बताते हुए कहा,"हंगरी, यूरोप में उत्पीड़न के खिलाफ गर्वीले और संप्रभु लोगों के प्रतिरोध का एक प्रतीक बन गया है." इटली के उप प्रधानमंत्री मातेयो साल्विनी ने भरोसा जताया कि हंगरी के मतदाता "पूरे गर्व के साथ और हंगरी के हितों को दिमाग में रखकर" फैसला लेंगे.
साल्विनी ने क्रिश्चियन पहचान का भी जिक्र किया, "उनकी पसंद होगी आत्मसंकल्प को सहेजने के लिए, हजार साल पुरानी ईसाई पहचान को बनाए रखने के लिए, हंगरी के परिवारों के लिए, सीमाएं सुरक्षित रखने के लिए और एक ऐसे भविष्य के लिए, जहां बच्चे अपने लिए खुद फैसला लेने में सक्षम होंगे." नीदरलैंड्स के धुर-दक्षिणपंथी दल पार्टी फॉर फ्रीडम (पीवीवी) के प्रमुख गेर्ट विल्डर्स की राय में ओरबान "भेड़ों द्वारा नेतृत्व किए जा रहे महाद्वीप में एक शेर" हैं.
अर्जेंटीना के राष्ट्रपति हावियर मिलेई ने कहा, "हंगरी जो भी तय करेगा, वो समूचे यूरोप में गूंजेगा." अमेरिका के उप राष्ट्रपति जेडी वैंस के भी सम्मेलन में हिस्सा लेने की उम्मीद थी. वैंस तब तो नहीं आए, लेकिन ओरबान को खुला समर्थन देने वह चुनाव के निर्णायक हफ्ते में दो दिन की यात्रा पर बुडापेस्ट पहुंचे.
अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप तो ओरबान के प्रशंसक हैं ही. कई मीडिया विश्लेषक मानते हैं कि ओरबान के राजनीतिक विचारों और शैली ने ट्रंप व उनके मागा अभियान को भी प्रेरणा दी है. ट्रंप के पहले कार्यकाल में कुछ समय तक उनके मुख्य रणनीतिकार रहे स्टीव बैनन ने एक दफा ओरबान को "ट्रंप बीफोर ट्रंप" (यानी, ट्रंप से भी पहले का ट्रंप) बताया था.
ओरबान की तारीफ में ट्रंप कंजूसी नहीं करते हैं. ओरबान के लिए उनके विचार हैं, "एक महान इंसान है, यूरोप में एक महान नेता है- विक्टर ओरबान. वह हंगरी के प्रधानमंत्री हैं. वह एक महान नेता हैं, बहुत मजबूत शख्स हैं." ट्रंप के मुताबिक, "कुछ लोग उन्हें (ओरबान) को पसंद नहीं करते, क्योंकि वह बहुत मजबूत हैं."
ओरबान की जीत में इस वृहद धुर-दक्षिणपंथी धड़े का क्या हित है?
क्या इसकी प्रेरणा एक कथित "कंजर्वेटिव क्रिश्चियन डिज्नीलैंड" है, जहां "परिवार, इतिहास, परंपरा, भाषा और धर्म" को तवज्जो देने के नाम पर अनुदारवादी और रूढ़िवादी देश बनाने का सपना पलता है? हंगरी के एक पत्रकार हैं, बलाज गूयास. उन्होंने अगस्त 2021 में 'माग्यार हांग' में एक खुला खत छापा था.
यह संबोधित था, अमेरिकी पत्रकार टकर कार्लसन को जो हंगरी की यात्रा पर आए थे और ओरबान का इंटरव्यू किया था. हंगैरियन में लिखे गूयास के पत्र का अंग्रेजी अनुवाद बाद में 'दी बुलवर्क' ने छापा. इसमें लिखा था:
परिवार, इतिहास, परंपरा और भाषा ये सभी मूल्य हंगरी के लाखों लोगों के लिए बेहद अहम हैं. ओरबान के लिए ये सभी "राजनीतिक उपभोक्ता उत्पाद" हैं. ओरबान अपनी सत्ता के असली स्वभाव पर लबादा ओढ़ाने के लिए इन मूल्यों का इस्तेमाल करते हैं, जो हैं: जनता के पैसों की चोरी और इस चोरी को जारी रखने के लिए जरूरी सत्ता को बनाए रखना. बात जब ओरबान पर आती है, तो आप शिद्दत से यकीन करना चाहते हैं कि इस ग्रह पर कहीं एक क्रिश्चियन कंजर्वेटिव डिज्नीलैंड है.
गूयास ने आगे लिखा :
हो सकता है शायद वो कंजर्वेटिव क्रिश्चियन डिज्नीलैंड इस दुनिया में कहीं और हो, लेकिन फिलहाल इसे हंगरी में तो नहीं पाया जा सकता है. डिअर मिस्टर कार्लसन! आपके मेजबानों ने आपको गुमराह किया है. विक्टर ओरबान हंगरी में एक कंजर्वेटिव क्रिश्चियन डिज्नीलैंड नहीं बना रहे हैं, बल्कि खुद को फायदा पहुंचाते के साथ-साथ एक रूसी और चीनी चौकी बना रहे हैं.
ऐसा लगता है ओरबान पर हंगरी के रूढ़िवादियों की राय, बाहरी कंजर्वेटिव संसार की राजनीतिक अपेक्षाओं और महत्वाकांक्षाओं से मेल नहीं खाती. फिर यह भी बात है कि मतदान देश के लोग करते हैं. बाहर से चाहे जितनी अपील आए, जिस भी पक्ष-विपक्ष में आए, असली फैसला तो हंगरी के मतदाता ही करेंगे. विपक्ष के लिए चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में बढ़त का सीधा-सरल अनुवाद जीत नहीं है. ना केवल सच में जीतना, बल्कि दो-तिहाई बहुमत की जादुई चाबी भी बहुत अहम है.
संवैधानिक संशोधनों के नाम पर खेल के अपने नियम बनाने और उन्हें कानूनी शक्ल देने में माहिर ओरबान क्या करेंगे, यह अहम होगा. एक बड़ी चिंता यह है कि कहीं वो अपनी एकदलीय सत्ता को असीमित बनाने या उसकी वैलिडिटी और आगे बढ़ाने का तरीका तो नहीं खोज लेंगे! ओरबान जीतेंगे, हारेंगे, या हारकर भी जीत की गुंजाइश निकाल लेंगे इसका फैसला 12 अप्रैल को होगा.













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