कैसे संकट में आया जर्मनी की खासियत रहा 'सोशल वेलफेयर सिस्टम'
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

जर्मनी के सोशल वेलफेयर सिस्टम यानी सामाजिक सुरक्षा तंत्र में योगदान के मुद्दे पर तनाव बढ़ रहा है. आर्थिक विशेषज्ञ बड़े सुधारों की जरूरत पर बल दे रहे हैं वहीं स्वास्थ्य कर्मियों को इससे जुड़ी कई चिंताएं हैं.जर्मनी का सोशल वेलफेयर सिस्टम अब देश की आर्थिक सेहत के लिए बड़ा बोझ बनता जा रहा है. स्वतंत्र आर्थिक विशेषज्ञों की सलाहकार परिषद ने जर्मन सरकार को चेताया है कि अगर सामाजिक सुरक्षा में जाने वाले लोगों के योगदान में सुधार नहीं किया गया, तो बढ़ती बुजुर्ग आबादी के खर्चे देश की आर्थिक वृद्धि में रुकावट बनेंगे.

परिषद की प्रमुख मोनिका श्नित्सर ने बर्लिन में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि साल 2040 तक सामाजिक सुरक्षा योगदान एक कर्मचारी के वेतन का लगभग आधा हिस्सा खा जाएगा. ये अभी के 42 प्रतिशत से बढ़कर करीब 50 प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है. श्नित्सर ने इसे "बहुत ज्यादा" बताते हुए कहा, "इसका सीधा मतलब है कि कर्मचारियों के हाथ में कम पैसा आएगा, लोग उपभोग कम करेंगे, काम करने की इच्छा घटेगी और कंपनियों की लागत बढ़ेगी. यह अर्थव्यवस्था के लिए बेहद बुरा है."

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विशेषज्ञों के अनुसार, साल 2005 से स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला खर्च योगदान से अधिक तेजी से बढ़ा है, और 2017 से बुजुर्गों की देखभाल का खर्च आसमान छू रहा है. कम जन्म दर और रिटायर्ड होने वाले बुजुर्गों की बढ़ती संख्या इस संकट को और गंभीर बना रही है.

हेल्थकेयर सिस्टम में बड़े बदलाव; अस्पतालों में विरोध

जर्मनी के महंगे और बीमार पड़ रहे हेल्थकेयर सिस्टम में अरबों यूरो के घाटे को पाटने के लिए सरकार एक व्यापक सुधार पैकेज ला रही है. इस योजना का मकसद हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों के बोझ को घटाना है, जिससे भविष्य में सामाजिक सुरक्षा के लिए किया जाने वाला हिस्सा बढ़ने की आशंका कम हो सके. सत्तारूढ़ सीडीयू पार्टी की स्वास्थ्य मंत्री नीना वार्केन द्वारा तैयार इस मसौदे का उद्देश्य पब्लिक हेल्थ इंश्योरेंस के कॉन्ट्रिब्यूशन को और बढ़ने से रोकना है. वार्केन ने बर्लिन में कहा, "हम अपनी कमाई से ज्यादा खर्च नहीं कर सकते."

जर्मनी में स्वास्थ्य बीमा अनिवार्य है और करीब 90 प्रतिशत आबादी पब्लिक इंश्योरेंस के दायरे में आती है. इस साल अंशदान में औसतन 3 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, जबकि बीमा कंपनियों का खर्च कहीं अधिक तेजी से बढ़ रहा है. सुधारों के तहत अब महंगी सर्जरी के लिए किसी और विशेषज्ञ डॉक्टर की राय अनिवार्य होगी और होम्योपैथी का खर्च बीमा के दायरे से बाहर कर दिया जाएगा. अगर बचत के ये उपाय लागू नहीं किए गए, तो साल 2027 तक पब्लिक हेल्थ इंश्योरेंस फंड को 15 अरब यूरो से अधिक के बजट घाटे का सामना करना पड़ेगा.

सरकार के इस 'लागत कटौती अभियान' के खिलाफ अस्पताल के कर्मचारियों ने मोर्चा खोल दिया है. सर्विस सेक्टर की ट्रेड यूनियन 'वेर्डी' इसके विरोध में प्रदर्शन आयोजित कर रही है. यूनियन की बोर्ड सदस्य सिल्विया बूलर ने चेतावनी दी है कि इन उपायों से मरीजों की देखभाल की गुणवत्ता प्रभावित होगी और कामकाजी परिस्थितियों में हुए सुधार उल्टे पड़ जाएंगे.

इस पैकेज के जरिए सरकार 2027 तक बीमा कंपनियों पर से 16.3 अरब यूरो का बोझ कम करना चाहती है. इसमें क्लीनिकों, डॉक्टरों और फार्मास्युटिकल सेक्टर पर खर्च की सीमा तय करना, दवाओं के लिए जेब से अधिक भुगतान और जीवनसाथी के लिए मुफ्त कवरेज को सीमित करना शामिल है. अकेले अस्पतालों से ही 4.6 अरब यूरो की बचत का लक्ष्य है, जिसका कर्मचारी कड़ा विरोध कर रहे हैं. यह विधेयक अब गर्मियों की छुट्टियों से पहले संसद से पास कराने की तैयारी है.

चांसलर मैर्त्स की गिरती लोकप्रियता और भविष्य की चुनौती

चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स के नेतृत्व वाली मध्य-वामपंथी एसपीडी और मध्य-दक्षिणपंथी सीडीयू की गठबंधन सरकार ने पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं में कड़े सुधारों का वादा किया था. हालांकि, परिषद के विशेषज्ञ मार्टिन वेर्डिंग ने सरकार पर मुश्किल फैसलों से बचने का आरोप लगाया. मैर्त्स के पिछले साल के "सुधारों के पतझड़" वाले वादे पर तंज कसते हुए वेर्डिंग ने कहा, "अच्छी बात यह है कि पतझड़ हर साल आता है. हम एक और पतझड़ देख सकते हैं, लेकिन अब तक कोई खास सुधार नहीं दिखे हैं."

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यह आर्थिक संकट ऐसे समय पर आया है जब चांसलर मैर्त्स खुद राजनीतिक मोर्चे पर घिरे हुए हैं. हालिया 'डॉएचलांडट्रेंड' के एक सर्वे के अनुसार, केवल 16 प्रतिशत मतदाता मैर्त्स के कामकाज से संतुष्ट हैं, जो किसी भी चांसलर के लिए सबसे कम रेटिंग है.इसी साल जर्मन वर्कफोर्स को "सुस्त" बताने के आरोपों पर घिरे मैर्त्स ने वुर्त्सबर्ग में अपनी कमियों को स्वीकार करते हुए कहा कि उन्हें अपने कम्युनिकेशन (संवाद) क्षमता में सुधार करना होगा. उन्होंने सफाई दी कि उनका मकसद जर्मनों को आलसी कहना नहीं था, बल्कि वे सिर्फ यह तुलना कर रहे थे कि स्विट्जरलैंड में लोग जर्मनी से सालाना 200 घंटे अधिक काम करते हैं और वहां की स्थिति बेहतर है.

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मध्य पूर्व संकट और ईरान के होर्मुज जलडमरूमध्य को लगभग पूरी तरह बंद करने के कारण तेल-गैस की बढ़ी कीमतों को देखते हुए परिषद ने 2026 के लिए जर्मनी की आर्थिक विकास दर का अनुमान 0.9 प्रतिशत से घटाकर 0.5 प्रतिशत कर दिया है. यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद बढ़ी ऊर्जा लागत और चीनी प्रतिस्पर्धा से जर्मनी पहले ही जूझ रहा है. इसके बावजूद, चांसलर मैर्त्स ने अपने गृह नगर आर्न्सबेर्ग में देश के ऐतिहासिक पुनर्निर्माण का हवाला देते हुए भरोसा जताया कि जर्मनी में नए सिरे से शुरुआत करने की ताकत है और वे सुधारों को आगे बढ़ाएंगे.