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महिला फुटबॉल में मुनाफा कमाने से बढ़कर है जर्मनी का लक्ष्य

यूरो 2029 की मेजबानी जर्मनी को मिली है.

महिला फुटबॉल में मुनाफा कमाने से बढ़कर है जर्मनी का लक्ष्य
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

यूरो 2029 की मेजबानी जर्मनी को मिली है. यह आयोजन महिला फुटबॉल के लिए मुनाफे से आगे बढ़कर विरासत बनाने का मौका है. दुनिया को दिखाने का समय है कि महिलाओं के खेल में निवेश करना भविष्य के लिए एक बेहतरीन कदम है.महिला यूरोपियन चैंपियनशिप अब अपने रिकॉर्ड चैंपियन के पास लौट रही है. इस प्रतियोगिता को आठ बार जीतने वाला जर्मनी, 2001 के बाद पहली बार महिला यूरो की मेजबानी कर रहा है. इस समय पूरा ध्यान जर्मन फुटबॉल संघ (डीएफबी) के उस लक्ष्य पर है, जिसमें वह इसे मुनाफा कमाने वाला पहला महिला यूरो टूर्नामेंट बनाना चाहता है.

पोपी सोतिरियादौ ने डीडब्ल्यू को बताया, "महिला यूरो का ‘मुनाफे' में रहना एक बड़ा संदेश देता है, लेकिन यह लंबे समय तक अच्छी स्थिति की गारंटी नहीं है. 2029 के टूर्नामेंट की सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि उससे जर्मनी में महिलाओं और लड़कियों के फुटबॉल को क्या फायदा मिला, न कि सिर्फ इस बात से कि बैंक खाते में कितना पैसा बचा.”

सोतिरियादौ ऑस्ट्रेलिया की ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी में पर्यटन और मार्केटिंग विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं और महिला स्पोर्ट्स बिजनेस की एक्सपर्ट हैं.

डीएफबी का मुनाफा कमाने की यह योजना 10 लाख से ज्यादा टिकटों की बिक्री, मेजबान शहरों से मिलने वाली आर्थिक मदद और जर्मन कारोबारों के समर्थन पर टिकी हुई है. सोतिरियादौ का मानना है कि अगर जर्मनी 10 लाख टिकटों की बिक्री के लक्ष्य को हासिल कर लेता है या उससे आगे निकल जाता है, मीडिया राइट्स (प्रसारण अधिकार) की वैल्यू बढ़ाता है और कई सालों के लिए अच्छे प्रायोजक जुटा लेता है, तो मुनाफा कमाना मुमकिन है.

उन्होंने कहा, "महिला यूरो का मुनाफे में रहना या तो सिर्फ एक बड़ी खबर बन सकती है या फिर खेल के लिए एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है. फर्क इस बात से पड़ेगा कि क्या उस मुनाफे की रकम को विशेष रूप से महिला फुटबॉल के विकास के लिए अलग रखा जाएगा या उसे चुपचाप सामान्य बजट में खपा दिया जाएगा.”

बुंडेसलीगा के 14 क्लबों ने हाल ही में एफबीएल (महिला बुंडेसलीगा एसोसिएशन) की स्थापना की है. इसका उद्देश्य लीग की मार्केटिंग और इसे और अधिक पेशेवर बनाना है. चौंकाने वाली बात यह है कि इस प्रक्रिया में डीएफबी को शामिल नहीं किया गया. विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों के बीच तालमेल की यह कमी भविष्य के लिए सही नहीं है. ऐसे में महिला फुटबॉल के लिए डीएफबी की ओर से घोषित 100 मिलियन यूरो की वित्तीय मदद के भविष्य पर भी अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं. फिर भी, खेल जगत में यह चर्चा है कि देर-सबेर डीएफबी को इस पहल का हिस्सा बनाया जाएगा.

महिलाओं के खेलों में निवेश फायदेमंद साबित होगा

एलेक्स कल्विन, इंटरनेशनल फुटबॉल प्लेयर यूनियन ‘एफआईएफपीआरओ' में महिलाओं के फुटबॉल की डायरेक्टर हैं. पूर्व खिलाड़ी कल्विन का मानना है कि महिला टूर्नामेंट अंततः मुनाफे वाले साबित होंगे, क्योंकि महिलाओं के खेलों में निवेश करना पहले से ही व्यावसायिक रूप से समझदारी भरा कदम है.

उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि महिलाओं के खेल में निवेश करना एक स्मार्ट बिजनेस आइडिया साबित हुआ है. महिला फुटबॉल में जो चीजें कीमती या महत्वपूर्ण हैं, वे पुरुष फुटबॉल की तुलना में अलग हैं.”

कल्विन के मुताबिक, महिला फुटबॉल मूल रूप से एक स्टार्टअप है. इसके लिए वही 'स्टार्टअप मेंटालिटी' चाहिए. सफलता के लिए स्टार्टअप वाली सोच जरूरी है. वेंचर कैपिटलिस्ट महिला फुटबॉल के बाजार में इसलिए कामयाब हैं, क्योंकि वे इसे एक प्रोडक्ट के रूप में देख रहे हैं.

उन्होंने आगे बताया, "मैं इसे व्यावसायिक रूप से मुनाफे वाला और स्थिरता सुनिश्चित करने वाला कैसे बनाऊं? इसके लिए, मैं इस खेल की बढ़ती लोकप्रियता और प्रभाव को आधार बनाती हूं. मैं इसे एक ऐसे आकर्षक उत्पाद के रूप में ब्रांड करती हूं जो न सिर्फ बाजार में बिकने योग्य हो, बल्कि निवेशकों के लिए एक सुरक्षित और मुनाफे वाला विकल्प भी बने.”

जर्मन फुटबॉल संघ के प्रस्ताव से यह तो साफ पता चलता है कि इन बातों पर विचार किया गया है और आगे भी किया जाएगा. लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या खिलाड़ियों की वैल्यू को भी ध्यान में रखा जाएगा.

कल्विन ने कहा, "महिला खिलाड़ी वाकई प्रभावित करने वाली हैं. वे बुनियादी तौर पर सामाजिक बदलाव लाने वाली एक्टिविस्ट की तरह हैं क्योंकि उन्होंने हाशिए पर रहकर संघर्ष किया है. उन्होंने भेदभाव को झेला है. इसलिए, वे भेदभाव को खत्म करना चाहती हैं. वे न सिर्फ मैच जीतना चाहती हैं, बल्कि समाज में भी बदलाव लाना चाहती हैं. वे मैदान पर और मैदान के बाहर एक विरासत छोड़ना चाहती हैं. अगर मैं एक निवेशक होती, तो मेरे लिए यह बात व्यावसायिक रूप से बहुत कीमती होती.”

महिलाओं के साथ आने से आते हैं बड़े बदलाव

इस टूर्नामेंट के आर्थिक पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन यहां और भी बहुत कुछ चल रहा है. जर्मनी की कप्तान जूलिया ग्विन ने हाल ही में एक पॉडकास्ट में माना कि खेल में सेक्सिज्म, यानी लैंगिक भेदभाव से लड़ना उनके लिए सबसे मुश्किल लड़ाइयों में से एक रहा है. सच तो यह है कि जर्मनी में प्रोफेशनल खेल में कई महिलाओं के लिए पितृसत्ता अभी भी एक समस्या बनी हुई है. जर्मनी की मौजूदा महिला टीम कई मुद्दों पर खुलकर बोलती रही है. इसमें हाल ही में "ऑरेंज द वर्ल्ड” कैंपेन में आगे बढ़कर हिस्सा लेना भी शामिल है, जो महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा का विरोध करता है.

खेल के मैदान पर महिला कोचों को कब मिलेगा बराबरी का हक

कल्विन के मुताबिक, अगर ये कैंपेन टीम की अपनी सोच और पसंद से मेल खाते हैं, तो ये एक मजबूत संदेश दे सकते हैं. लेकिन इसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी देश के टॉप फुटबॉलरों पर नहीं होनी चाहिए. उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि हाशिए पर रहने वाले लोगों से ही प्रगतिशीलता की मशाल थामने की उम्मीद करना हमेशा गलत है. आप ऐसा हर जगह देखते हैं. अश्वेत लोगों से उम्मीद की जाती है कि वे गोरों को समझाएं कि रंगभेद अपमानजनक क्यों है और महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि वे पुरुषों को लैंगिक भेदभाव समझाएं. यह अपने आप में एक बहुत ही अनुचित जिम्मेदारी है.”

उन्होंने आगे कहा, "मेरा मानना है कि जब महिला फुटबॉल और उसके खिलाड़ी मिलकर किसी चीज को हासिल करने के लिए काम करते हैं, तो वे बड़े बदलाव ला सकते हैं. ये खिलाड़ी अपने सीमित संसाधनों और प्रभाव के बावजूद दुनिया पर एक सकारात्मक और गहरी छाप छोड़ना चाहते हैं.”

कल्विन कहती हैं कि इससे कोई बड़ा बदलाव आएगा या नहीं, मैं नहीं जानती. लेकिन मुझे लगता है कि दुनिया भर की महिलाओं के साथ एकजुटता दिखाने की खिलाड़ियों की यह मंशा, एक समूह के रूप में उनकी काबिलीयत और जज्बे का प्रमाण है.”

जर्मनी की महिला खिलाड़ी अपनी बात बेबाक तरीके से रखती हैं. वे मैदान के बाहर अपने सामूहिक कार्यों के लिए जानी जाती हैं. जाहिर है, यूरो 2029 को मुनाफे वाला टूर्नामेंट बनाना देश में महिला फुटबॉल की सफलता बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम है. लेकिन इस टूर्नामेंट की असली विरासत मुनाफे और नुकसान के आंकड़ों से कहीं बढ़कर है.

क्या यूरो 2029 की मेजबानी से फुटबॉल खेलने वाली लड़कियों की संख्या बढ़ेगी? क्या महिला बुंडेसलीगा मैचों को देखने ज्यादा लोग आएंगे? क्या मीडिया कवरेज बढ़ेगा? और सबसे जरूरी, क्या समाज में महिलाओं के प्रति नजरिया बदलेगा?

यही इस टूर्नामेंट की असली विरासत के पैमाने हैं. अगर इन्हें हासिल कर लिया जाता है, तो 2029 की वह गर्मियां, पुरुषों के 2006 और 2024 के टूर्नामेंटों की तरह, जर्मनी के लिए सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से असरदार बनने का मौका है.

(The above story first appeared on LatestLY on Dec 19, 2025 07:10 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).