कोई खिलाड़ी किस देश से है, क्या ओलंपिक में यह मायने रखता है?
जब कोई खिलाड़ी जिस देश में जन्मा है, उसके अलावा किसी दूसरे देश की ओर से ओलंपिक में खेलता है, तो अक्सर बहस छिड़ जाती है.
जब कोई खिलाड़ी जिस देश में जन्मा है, उसके अलावा किसी दूसरे देश की ओर से ओलंपिक में खेलता है, तो अक्सर बहस छिड़ जाती है. राष्ट्रीय पहचान को लेकर चर्चा छिड़ जाती है. लेकिन असल में इसके क्या मायने होते हैं?इटली में स्वर्ण पदक जीतकर, शीतकालीन ओलंपिक में पदक जीतने वाले पहले दक्षिण अमेरिकी बनने के बाद लुकस पिन्हाइरो ब्राथेन ने कहा, "मुझे उम्मीद है कि ब्राजील के लोग इसे देखकर समझेंगे कि आपकी अलग पहचान ही आपकी सबसे बड़ी ताकत है.”
ब्राथेन ने 2022 शीतकालीन ओलंपिक में नॉर्वे की ओर से हिस्सा लिया था. उनकी मां ब्राजील की हैं और पिता नॉर्वे के हैं. हालांकि, ऐसी मिली-जुली राष्ट्रीयता रखने वाले वह अकेले खिलाड़ी नहीं हैं. लेकिन उनकी सफलता ने ओलंपिक में राष्ट्रीयता और पहचान को लेकर चल रही पुरानी बहस को फिर से रफ्तार दे दी है.
ओलंपिक में कौन-सा खिलाड़ी किस देश से खेलता है, यह इन पांच कारणों पर निर्भर करता है
गाइस्बर्ट ओंक, रॉटरडाम के इरास्मस यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं. वह वैश्विक इतिहास, खेल, खिलाड़ियों के प्रवास और राष्ट्रीय पहचान पर शोध करते हैं. उनका कहना है कि खेलों में राष्ट्रीयता पर बात करते समय कई अहम पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है.
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सबसे पहला कारण तो खुद खिलाड़ी होते हैं, जो ऊंचे स्तर पर खेलना चाहते हैं. लेकिन कई बार वह दो देशों के बीच फंसे होते हैं. एक तरफ वह देश होता है, जिसने उनकी ट्रेनिंग और करियर में निवेश किया और उन्हें अपने पास ही रखना चाहता है. वहीं, दूसरी तरफ वह देश होता है, जो उन्हें अपने लिए खेलने का मौका देता है, ताकि खिलाड़ी पदक जीतकर उनकी प्रतिष्ठा बढ़ा सके. फिर खेल संघ (यानी स्पोर्ट्स फेडरेशन) होते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सभी के लिए बराबरी का मैदान बनाना चाहते हैं और आखिर में दर्शक और प्रशंसक होते हैं, जो अपने खिलाड़ियों से जुड़ा हुआ महसूस करना चाहते हैं.
ओंक ने डीडब्ल्यू से कहा, "यहां एक तरह की खींचतान है कि कौन तय करेगा कौन किस देश से है?” उन्होंने आगे कहा, "देश आपको नागरिकता देते हैं, लेकिन अब खेलों में देश कुछ खिलाड़ियों को बहुत जल्दी नागरिकता दे रहे हैं. जबकि एक आम आदमी के पास इतनी जल्दी नागरिकता पाने की कोई सुविधा नहीं होती.”
कनाडा की मैकमास्टर यूनिवर्सिटी में खेल मानवशास्त्र की प्रोफेसर, कैरेन मैकगैरी मानती हैं कि खिलाड़ियों की सबसे बड़ी प्रेरणा होती है, दुनिया के सबसे ऊंचे स्तर पर खेल पाने की इच्छा. मैकगैरी ने डीडब्ल्यू से कहा, "ओलंपिक जैसे अंतरराष्ट्रीय खेलों में खिलाड़ी धीरे-धीरे ज्यादातर उस देश की ओर बढ़ेंगे, जो उन्हें सबसे ज्यादा संसाधन, सुविधा या जीतने के सबसे अच्छे मौके देगा.”
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उनके अनुसार, "आइस डांसिंग की मौजूदा फ्रांसीसी ओलंपिक चैंपियन, लॉरेंस फोर्निए बोद्री ने कनाडा, डेनमार्क और फ्रांस, तीनों देशों के लिए प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया है. कुछ लोगों को लगता है कि ऐसा करना स्वार्थी है, सिर्फ खुद के बारे में सोच के लिया गया फैसला है और उस ‘ओलंपिक भावना' के खिलाफ है, जिसमें एक देश को प्रतियोगिता का केंद्र माना जाता है. हालांकि, वहीं कुछ लोगों को इस बात से बिल्कुल भी फर्क नहीं पड़ता.”
अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) के नियमों के अनुसार, अगर कोई खिलाड़ी ओलंपिक या किसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में किसी एक देश के लिए खेल चुका है, तो उसे दूसरे देश के लिए खेलने से पहले तीन साल का इंतजार करना होता है.
लेकिन जैसे-जैसे दुनिया की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियां बदल रही हैं, वैसे-वैसे खासकर खेल में राष्ट्रीयता को देखने का नजरिया भी बदल रहा है. मॉस्को टाइम्स की एक खबर के अनुसार, इस महीने इटली में अन्य देशों के लिए प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए 30 से भी ज्यादा रूसी खिलाड़ियों ने अपनी खेल राष्ट्रीयता बदली है.
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मैकगैरी ने कहा, "जैसे कि मैं कनाडा से हूं और फिलहाल कनाडा में देशभक्ति और राष्ट्रवाद की भावना बहुत तेज है. जो कि काफी हद तक (अमेरिकी राष्ट्रपति) डॉनल्ड ट्रंप की ओर से टैरिफ लगाने और राजनीतिक दबाव के खतरे के खिलाफ एक तरह की प्रतिक्रिया है.”
उन्होंने आगे कहा, "जब राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो देश अक्सर बंद, बाहर वालों को कम स्वीकार करने वाले और अत्याधिक राष्ट्रवादी हो जाते हैं. जिसके चलते यह सोच ओलंपिक खेलों तक भी पहुंच सकती है, खासकर मीडिया रिपोर्टिंग में.” जैसे कि यूक्रेन के शीतकालीन ओलंपिक खिलाड़ी, व्लादिस्लाव हेरास्केविच की कहानी भी इसका एक उदाहरण हो सकता है.
शुरुआती दौर में खिलाड़ी हुआ करते थे पहचान
राष्ट्रीयता बदलना कोई नई बात नहीं है. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि ओलंपिक का शुरुआती मूल विचार कभी यह था ही नहीं कि खिलाड़ी देशों का प्रतिनिधित्व करें. ओंक ने कहा, "शुरुआत में ऐसे कोई नियम नहीं थे.” उन्होंने आगे कहा, "तब विचार यह था कि खिलाड़ी खुद का प्रतिनिधित्व करें, न कि किसी देश या राजा का.”
अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) के सह-संस्थापक, बारोन पियरे दे कूबर्टिन ने कहा था, "मेरे अनुसार असली ओलंपिक हीरो एक व्यक्तिगत वयस्क पुरुष होता है.”
हालांकि, उनकी सोच आज के समय में लैंगिक समानता के लिहाज से पुरानी लगती है. लेकिन इससे यह साफ है कि उस समय ध्यान देश पर नहीं, बल्कि खिलाड़ी पर था. उसके बाद, देशों से कहा गया कि वे अपने सबसे अच्छे खिलाड़ियों को चुनकर भेजें और तब से ओलंपिक में चीजें बदलने लगी. ओंक ने समझाया, "और यहीं से देशों की भूमिका बढ़ने लगी. वह अपने हित, पैसे, राजनीति, झंडे और राष्ट्रगान के साथ अहम होने लगे.”
इसके अलावा, ओंक का मानना है कि मेडल टेबल बनाने की मीडिया परंपरा ने भी देशों के बीच प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया है. यह चलन 1920 और 1930 के दशक में शुरू हुआ, जब ओलंपिक एक बड़े और लोकप्रिय आयोजन के रूप में स्वीकार किया जाने लगा और अमेरिका और ब्रिटेन के बीच मुकाबला और अधिक गंभीर हो गया.
हालांकि, 1980 के दशक के बाद से दुनिया में माइग्रेशन बढ़ा और खिलाड़ी ट्रेनिंग व करियर के लिए अलग-अलग देशों में जाने लगे. लेकिन फिर भी राष्ट्रीयता की भावना आज भी बहुत मजबूत बनी हुई है. मैकगैरी ने कहा, "घरेलू स्तर पर राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद का एक तरह का बाजारू मूल्य होता है.”
उन्होंने आगे कहा, "जैसे ओलंपिक के कॉरपोरेट स्पॉन्सर समझते हैं कि खिलाड़ियों को ‘अपने देश का खिलाड़ी' दिखाना फायदेमंद होता है ताकि लोगों में "देश” के खिलाड़ियों के लिए भावनात्मक जुड़ाव पैदा किया जा सके.”
दर्शकों की भूमिका को कम नहीं आंकना
लोगों की सोच और नजरिया बहुत महत्वपूर्ण होता है. किसी खिलाड़ी को दुनिया कैसे देखती है, इससे ही तय होता है कि उसे स्वीकार किया जाएगा या नहीं. ओंक ने कहा, "दर्शक काफी राष्ट्रवादी होते हैं क्योंकि उन्हें राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय मीडिया के जरिए वही नजरिया दिखाया जाता है.” साथ ही, उन्होंने यह भी जोड़ा कि स्कूलों में राष्ट्रीय इतिहास कैसे पढ़ाया जाता है, यह भी लोगों की सोच को बहुत हद तक प्रभावित करता है.
उनके अनुसार, "राष्ट्रीयता या किसी विशेष समूह से जुड़ाव की भावना को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है. जबकि अकादमिक दुनिया में इसे हम ‘काल्पनिक समुदाय' कहते हैं. ‘मैं उस खिलाड़ी को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता, लेकिन वो हम में से एक है, वह मेरी भाषा बोलता है, वह मेरे देश का है….' लेकिन अगर हम गहराई से, अकादमिक और दार्शनिक नजरिए से देखें, तो इससे क्या फर्क पड़ता है? आखिर ये बस अलग-अलग खिलाड़ी ही तो हैं, जो बस अपनी कोशिश कर रहे हैं. यानी जो जितना अच्छा स्केट कर सकते हैं, उतना कर रहे हैं.”
इन सब कारणों के चलते यह बहस आने वाले वर्षों में भी ऐसे ही जारी रहने वाली है. अभी का समय शायद यह सोचने के लिए एक अहम मौका है कि ओलंपिक में किसी देश का प्रतिनिधित्व करने का असल मतलब क्या है.
मैकगैरी ने कहा, "यह समय दिलचस्प है क्योंकि एक तरफ दुनिया में बहुत लोग अपने देश को लेकर ज्यादा कट्टर और बंद सोच वाले हो रहे हैं. लेकिन दूसरी तरफ कई लोग खुद को सिर्फ एक देश तक सीमित नहीं मानते, वह कई देशों और संस्कृतियों से जुड़ी अपनी पहचान को लचीला समझते हैं (राष्ट्रीय पहचान समेत).”
(The above story first appeared on LatestLY on Feb 20, 2026 06:20 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

